भ. गी. 1.2
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥
अनुवाद
सञ्जय ने कहा: उस समय, पाण्डवों की सेना को युद्ध के लिये तैयार देखकर राजा दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोण के पास जाकर ये शब्द कहे।
सञ्जय ने कहा: उस समय, पाण्डवों की सेना को युद्ध के लिये तैयार देखकर राजा दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोण के पास जाकर ये शब्द कहे।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): दुर्योधन द्रोणाचार्य के पास क्षमा माँगने या युद्ध रोकने के लिए नहीं गया था, बल्कि वह अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए चापलूसी और कूटनीति के द्वारा आचार्य को भड़काने गया था।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार दुर्योधन एक चतुर राजनीतिज्ञ की भाँति व्यवहार करता है। वह जानता था कि द्रोणाचार्य के मन में अपने प्रिय शिष्य अर्जुन के प्रति कोमलता है। इसलिए वह द्रोणाचार्य के परम शत्रु द्रुपद के पुत्र (धृष्टद्युम्न) को 'धीमान' कहकर आचार्य पर यह तंज कसता है कि आपने जानते हुए भी जिसे विद्या सिखाई, वही आज बुद्धिमान बनकर आपके विरुद्ध खड़ा है, ताकि आचार्य का स्वाभिमान जगे और वे पूरी शक्ति से युद्ध करें।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि जो केवल धन हरण करते हैं वे सच्चे आचार्य नहीं होते। इसके अतिरिक्त दुर्योधन का उद्देश्य गुरु को प्रसन्न करके आशीर्वाद दिलाना नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ के लिए आचार्य के मन में क्रोध उत्पन्न करना था।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान में आचार्य की परिभाषा दी गई है कि जो शास्त्र के अर्थ को समझाता है, शिष्यों को आचरण सिखाता है और स्वयं भी आचरण परायण होता है। दुर्योधन द्वारा द्रोणाचार्य के सामने उनके विरोधी शिष्य की 'धीमान' कहकर प्रशंसा करना यथार्थ प्रशंसा नहीं थी, बल्कि आचार्य को क्रोधित करने के उद्देश्य से की गई कूटनीतिक टिप्पणी थी।
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