अर्जुन-विषादयोग
इस अध्याय में सैंतालीस श्लोक हैं । एक श्लोक धृतराष्ट्र के द्वारा, इक्कीस अर्जुन के द्वारा और पच्चीस सञ्जय के द्वारा कहे गये हैं । धृतराष्ट्र निम्नलिखित प्रश्न से आरम्भ करते हैं, "हे सञ्जय, युद्ध के लिए उत्सुक कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?" (१) उत्तर में, सञ्जय कुरुक्षेत्र में युद्धभूमि के प्रथम दिन का वर्णन करना शुरू करते हैं (२) । कौरवों और पाण्डवों की सेनाएँ एक दूसरे के सामने खड़ी हैं । दुर्योधन पाण्डवों की सेना को देखकर अपने गुरु द्रोण के समीप जाता है । वह द्रोण को पाण्डवों के महान योद्धाओं से परिचित कराता है (३-६) । फिर वह अपनी सेना के योद्धाओं के विषय में बताता है और निष्कर्ष निकालता है कि, उसके सात मुख्य नायकों के अतिरिक्त कई अन्य योद्धा भी उसके लिए अपना जीवन त्यागने के लिए तैयार हैं (७-९) । वह दावा करता है कि भीम द्वारा सुरक्षित पाण्डवों की सेना की तुलना में उसकी अपनी सेना का बल अगाध है, जो सेना भीष्म पितामह द्वारा सुरक्षित है । वह अपने योद्धाओं से उनके अपने स्थान की रक्षा और सभी प्रयास से पितामह भीष्म की रक्षा करने का अनुरोध करता है । यह सुनकर भीष्म सिंह की तरह दहाड़ते हुए युद्ध आरम्भ करने का सङ्केत देने के लिए अपना शक्तिशाली शङ्ख बजाते हैं । इसके पश्चात् सभी महान नायक अपने-अपने शङ्ख और विभिन्न वाद्ययन्त्र बजाते हैं (१०-१७) । पाण्डवों के शङ्ख की भयानक ध्वनि धृतराष्ट्र के पुत्रों को बहुत व्याकुल करती है क्योंकि अधार्मिक लोगों के हृदय भय से भरे होते हैं ।
अगले श्लोकों में अर्जुन के कृत्यों का वर्णन है । अर्जुन अपने प्रिय मित्र तथा सारथी श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में स्थित करने के लिए निवेदन करता है, जिससे कि वह देख सके कि उसे किस-किसके साथ युद्ध करना होगा । जैसे ही श्रीकृष्ण इस निवेदन का अनुपालन करते हैं, अर्जुन को ज्ञात होता है कि उसे जिन शत्रुओं से युद्ध करना है, वे उसके अपने सम्बन्धी हैं (१८-२७) । वह दुःख और करुणा से ग्रस्त हो जाता है । अर्जुन श्रीकृष्ण को अपनी मानसिक स्थिति का वर्णन करता है, और युद्ध न करने के लिए तर्क देता है। वह श्रीकृष्ण से कहता है कि, "मुझे अपने परिजनों और सम्बन्धियों की हत्या करने में कोई श्रेय नहीं दिखता"। वह इङ्गित करता है कि वह अपने परिजनों और सम्बन्धियों की हत्या करके राज्य को पुनः प्राप्त नहीं करना चाहता है । वह तर्क देता है कि इससे वह पाप में लिप्त होगा और परिणाम-स्वरूप उसे नरक भोगना पड़ेगा । वह इस युद्ध को अधार्मिक मानता है जो पारिवारिक परम्पराओं को नष्ट कर देगा और परिवार की स्त्रियों को प्रदूषित कर देगा, तथा वर्णसङ्कर सन्तान (जो पारम्परिक सिद्धान्तों का पालन करने की इच्छुक नहीं होंगी) का कारण होगा । सञ्जय ने धृतराष्ट्र को यह बताकर अध्याय का समापन किया कि अर्जुन इतना दुःखी हुआ कि अपने बाण और धनुष को अलग रखकर वह रथ के पृष्ठ भाग में बैठ गया (२८-४७) ।
इस प्रकार प्रथम अध्याय अर्जुन की श्रीकृष्ण से शिक्षा पाने की भूमिका तैयार करता है । अर्जुन नवजात आध्यात्मिक साधक का प्रतिनिधित्व करता है । दोनों सेनाओं के मध्य स्थित होकर उन्हें देखना उसके सामर्थ्य और असामर्थ्य के मूल्याङ्कन का प्रतीक है । आध्यात्मिक यात्रा स्वयं के राग व द्वेष की आन्तरिक भावना से मानसिक युद्ध के समान है । श्रीकृष्ण शिक्षक हैं । बिना योग्य शिक्षक के मार्गदर्शन के कोई भी अपने वाञ्छित स्थान तक नहीं पहुँच सकता है । अपने देह से आसक्ति के कारण व्यक्ति अपना विवेक खो देता है और उचित-अनुचित कार्य का निर्णय करने में असमर्थ हो जाता है । व्यक्ति अपनी आसक्तियों को युक्तसङ्गत मानता है क्योंकि वह उन्हें त्यागना नहीं चाहता । आसक्ति व्यक्ति को निर्बल, असुरक्षित, भ्रमित, दयनीय और दुःखी बनाती है । यह निराशाजनक स्थिति अगर आध्यात्मिक जिज्ञासा की ओर ले जाए तो वह मानव की प्रगति का आधार बन जाती है । अतः यह महत्वपूर्ण है कि इस अध्याय को अर्जुन का विषाद योग, ("विषाद के माध्यम से उन्नति पथ") का नाम दिया गया है ।
सभी श्लोक
- श्लोक 1राजा धृतराष्ट्र ने कहा: हे सञ्जय ! कुरुक्षेत्र नामक धर्मक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से सम्मिलित हुए मेरे एवं पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?
- श्लोक 2सञ्जय ने कहा: उस समय, पाण्डवों की सेना को युद्ध के लिये तैयार देखकर राजा दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोण के पास जाकर ये शब्द कहे।
- श्लोक 3हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान शिष्य राजा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा युद्ध के लिए रची गई राजा पाण्डु के पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए ।
- श्लोक 4-6इस सेना में बड़े-बड़े धनुष धारण करने वाले सात्यकि और विराट जैसे शूरवीर एवं महारथी द्रुपद हैं जो पराक्रम में भीम और अर्जुन के समान हैं । धृष्टकेतु, चेकितान और काशी के पराक्रमी राजा हैं। पुरुजित, कुन्तीभोज और पुरुषों में श्रेष्ठ शैब्य भी है। पराक्रमी युधामन्यु, उत्तमौजा और सुभद्रा का पुत्र [अभिमन्यु] भी है । द्रौपदी के पाँच पुत्र भी हैं, जो सभी वास्तव में महारथी हैं ।
- श्लोक 7परन्तु, हे द्विजों* (दो बार जन्मे हुओं) में श्रेष्ठ, हमारे पक्ष के जो विशेष योद्धा हैं एवं मेरी सेना के नायक हैं, कृपया उनके सम्बन्ध में सूचित रहें। आपकी जानकारी के लिए मैं आपके समक्ष उनका वर्णन करूंगा।
- श्लोक 8[यहाँ] आप, भीष्म, कर्ण, युद्ध में विजयी कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण, और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा [ हैं ]।
- श्लोक 9विभिन्न प्रकार के हथियार चलाने वाले एवं युद्ध की कला में कुशल और भी अनेक शूरवीर पुरुष हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने प्राण को दाँव पर लगा दिया है ।
- श्लोक 10भीष्म द्वारा पूर्णतः सुरक्षित हमारी सेना की शक्ति अपरिमेय* है, जबकि भीम द्वारा पूर्णतः सुरक्षित उनकी सेना की शक्ति सीमित है।
- श्लोक 11[ तब दुर्योधन ने अपनी सेना से कहा: ] इसलिए, व्यूह में प्रवेश के सभी मोर्चों पर अपने निर्धारित स्थानों पर स्थित, आप सभी को वास्तव में केवल भीष्म की सभी ओर से रक्षा करनी चाहिए ।
- श्लोक 12[संजय ने कहा:] कुरुवंश के वरिष्ठ नायक, प्रतापी पितामह भीष्म ने, उसका [दुर्योधन का] उत्साह बढ़ाते हुए सिंह की तरह उच्च स्वर में दहाड़ा और अपना शङ्ख बजाया ।
- श्लोक 13इसके पश्चात् अचानक शङ्ख, नगाड़े, छोटे-बड़े ढोल और तुरही बज उठीं। वह शोर कोलाहलपूर्ण था ।
- श्लोक 14तब श्वेत घोड़ों से युक्त भव्य रथ पर बैठे श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने दिव्य शङ्ख बजाए ।
- श्लोक 15श्रीकृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया, अर्जुन ने अपना देवदत्त शङ्ख बजाया, और अत्यन्त भयानक कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक अपना भव्य शङ्ख बजाया ।
- श्लोक 16कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्त-विजय शङ्ख बजाया, जबकि नकुल सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक बजाया ।
- श्लोक 17-18हे पृथ्वी के सम्राट ! विशाल धनुष वाले काशी के राजा, और महारथी शिखण्डी, साथ ही धृष्टद्युम्न एवं विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पाँच पुत्र, और विशाल भुजाओं वाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु, इन सभी ने अपने-अपने शङ्ख बजाए ।
- श्लोक 19आकाश और पृथ्वी को गूँजाती हुई उस भयानक ध्वनि ने आपके पुत्रों और समर्थकों के हृदय को विदीर्ण कर दिया।
- श्लोक 20-21aहे सम्राट ! तब आपके पुत्रों और समर्थकों को युद्ध के लिए तैयार देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुन, जिनके ध्वज पर हनुमान का चिह्न है, ने तीर चलाने की तैयारी करते हुए अपना धनुष उठाया और उस समय इन शब्दों में श्री कृष्ण को सम्बोधित किया ।
- श्लोक 21b-22अर्जुन ने कहा: हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में स्थापित करें, ताकि मैं युद्ध के इच्छुक इन सभी योद्धाओं का निरीक्षण कर सकूं, जो युद्ध के मैदान में खड़े हुए हैं और जिनके साथ मुझे युद्ध के इस उद्यम में लड़ना है ।
- श्लोक 23मैं उन्हें देखूँगा जो इस युद्ध के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं, लड़ने के लिए तैयार हैं और धृतराष्ट्र के दुष्ट-बुद्धि पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करना चाहते हैं ।
- श्लोक 24-25सञ्जय ने कहा: हे भरतवंशी, गुडाकेश (अर्जुन) द्वारा इस प्रकार सम्बोधित किए जाने पर हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने भीष्म, द्रोण और पृथ्वी के सभी शासकों के सम्मुख एवं दोनों सेनाओं के मध्य में उत्तम रथ को स्थापित किया और कहा, “हे पार्थ (अर्जुन), इन कौरवों को यहाँ एकत्रित हुए देखो ।
- श्लोक 26-27aइसके पश्चात् अर्जुन ने दोनों सेनाओं के मध्य में अपने चाचा-ताऊओं* को, दादाओं को, आचार्यों को, मामाओं को, भाईयों एवं चचेरे भाईयों को, पुत्रों एवं भतीजों को, पौत्रों एवं चचेरे पौत्रों को, मित्रों को, ससुरों तथा सुहृदों को भी वहां उपस्थित देखा ।
- श्लोक 27b-28aकुन्तीपुत्र इन सब सम्बन्धियों को युद्धभूमि में अवस्थित देखकर अत्यन्त कृपा से आविष्ट हो गये और विषाद - भाव से ये वचन बोले ।
- श्लोक 28b-29अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण, युद्ध की इच्छा से इन सम्बन्धियों को यहाँ उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूख रहा है । मेरा शरीर काँप रहा है, और रोङ्गटे खड़े हो गए हैं।
- श्लोक 30मेरा गाण्डीव धनुष हाथ से गिर रहा है और मेरी त्वचा वास्तव में जल रही है । मैं ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा हूँ और मेरा मन भ्रमित हो रहा है ।
- श्लोक 31हे केशव ! मैं अशुभ लक्षणों को भी देख रहा हूँ और युद्ध में अपने स्वजनों की हत्या करने में कोई श्रेय नहीं देख रहा हूँ।
- श्लोक 32हे कृष्ण ! मुझे न विजय की, न साम्राज्य की और न भोग की आकाङ्क्षा है । हे गोविन्द, हम राज्य लेकर क्या करेंगे ? भोग के साधन या जीवित रहने का भी क्या उपयोग है ?
- श्लोक 33-34जिनके लिए हम साम्राज्य, भोग और सुख की आकाङ्क्षा रखते हैं – हमारे आचार्य, चाचा ताऊ, बेटे और भतीजे, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, बहनोई, और अन्य सम्बन्धी – वे तो अपने प्राण एवं धन दाँव पर लगाकर यहाँ युद्धभूमि पर अवस्थित हैं ।
- श्लोक 35हे मधुसूदन ! यदि मैं उनके द्वारा मारा भी जाऊँ, तो भी मैं तीनों लोकों पर प्रभुत्व के लिए भी उन्हें मारना नहीं चाहता। पृथ्वी पर प्रभुत्व तो दूर की बात है।
- श्लोक 36हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों और अनुयायियों की हत्या कर हमें क्या सुख मिलेगा ? इन अत्याचारियों की हत्या करके हमें केवल पाप लगेगा।
- श्लोक 37इसलिए, अपने ही सम्बन्धी, धृतराष्ट्र के इन पुत्रों की हत्या करना हमारे लिए उचित नहीं है । हे माधव! हम अपने ही स्वजनों की हत्या करके कैसे सुखी हो सकते हैं?
- श्लोक 38-39यद्यपि लालच से वशीभूत चित्त के कारण वे अपने ही कुल के नष्ट होने में कोई दोष नहीं देखते हैं और मित्रों के साथ द्रोह करने में कोई पाप नहीं देखते हैं, हे जनार्दन, जब हम अपने कुल के नष्ट होने के दोष को स्पष्ट रूप से देखते हैं तो हम इस पाप से बचना क्यों नहीं जाने?
- श्लोक 40जब कुल नष्ट हो जाता है, तो प्राचीन कुल परम्पराएँ लुप्त हो जाती हैं और कुल परम्पराओं के नष्ट होने से, अधर्म* पूरे कुल पर हावी हो जाता है।
- श्लोक 41हे वृष्णिवंशी कृष्ण ! अधर्म के फैलने से कुल में स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं और स्त्रियों के दूषित होने से वर्णों का मिश्रण आरम्भ होता है ।
- श्लोक 42वर्णों के परस्पर मिश्रण से कुल को नष्ट करने वालों के साथ-साथ स्वयं कुल को भी केवल नरक ही प्राप्त होता है । उनके पूर्वज भी निश्चित रूप से चावल और जल* के श्राद्ध एवं तर्पण क्रियाओं से वञ्चित रह जाने के कारण निश्चित रूप से पतित हो जाते हैं ।
- श्लोक 43कुलों को नष्ट और वर्णों का मिश्रण कराने वाले इन दोषों के कारण जाति एवं कुल की प्राचीन परम्पराएँ विलुप्त हो जाती हैं।
- श्लोक 44हे जनार्दन ! हमने ऐसा पारम्परिक स्रोतों से सुना है कि जिनकी कुल परम्पराएँ नष्ट हो गई हैं वे अनिश्चित काल तक नरक में वास करते हैं ।
- श्लोक 45हाय ! हमने बड़ा पाप करने का निश्चय किया है क्योंकि हम राजसुख के लोभ से अपने ही स्वजनों की हत्या के लिए उद्यत हैं ।
- श्लोक 46मेरे लिए यह बेहतर होगा कि युद्ध में धृतराष्ट्र के पुत्र अपने हाथों में हथियार लेकर मुझे निहत्थे और प्रतिकार न करने की अवस्था में मार डालें ।
- श्लोक 47सञ्जय ने कहा – रणभूमि में ऐसा कहकर दुखी मन से शोकग्रस्त अर्जुन ने अपने धनुष और बाण रख दिये, और अपने रथ के पिछले भाग में बैठ गया ।
प्रश्न