भ. गी. 1.23
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥
अनुवाद
मैं उन्हें देखूँगा जो इस युद्ध के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं, लड़ने के लिए तैयार हैं और धृतराष्ट्र के दुष्ट-बुद्धि पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करना चाहते हैं ।
मैं उन्हें देखूँगा जो इस युद्ध के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं, लड़ने के लिए तैयार हैं और धृतराष्ट्र के दुष्ट-बुद्धि पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करना चाहते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि पांडवों की सेना केवल सात अक्षौहिणी थी जबकि कौरवों की सेना ग्यारह अक्षौहिणी थी (अर्थात कौरवों की सेना चालीस प्रतिशत अधिक बड़ी थी)। अतः संख्या बल के कारण नहीं, बल्कि अधर्म और पाप के आंतरिक भय के कारण कौरवों का हृदय विदीर्ण हुआ।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि अधर्म करने वाले व्यक्ति के हृदय में हमेशा एक अनजाना भय रहता है (जैसे महाबलशाली रावण भी चोरी करते समय डरा हुआ था)। शंख की ध्वनि तो दोनों पक्षों ने सुनी, किंतु कौरवों के अधार्मिक संस्कारों के कारण उस ध्वनि ने केवल उनके ही हृदय को विदीर्ण किया।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि यह स्थिति आध्यात्मिक साधक की यात्रा का प्रतीक है। अपने रथ (शरीर) को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर निरीक्षण करने का तात्पर्य है निष्पक्ष होकर अपने दोषों, अवगुणों और संस्कारों को पहचानना। तथा जिनका कभी पतन नहीं होता, ऐसे अच्युत (भगवान) की शरण लेकर ही माया के विरुद्ध युद्ध जीता जा सकता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन कोई दर्शक या क्रीड़ा देखने वाला नहीं था, न ही वह कोई चापलूसी कर रहा था। वह बिना किसी राजनीति के निष्कपट भाव से अपने शत्रुओं और अपनी शक्तियों व सीमाओं को समझने हेतु निरीक्षण करना चाहता था।
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