इस सेना में बड़े-बड़े धनुष धारण करने वाले सात्यकि और विराट जैसे शूरवीर एवं महारथी द्रुपद हैं जो पराक्रम में भीम और अर्जुन के समान हैं । धृष्टकेतु, चेकितान और काशी के पराक्रमी राजा हैं। पुरुजित, कुन्तीभोज और पुरुषों में श्रेष्ठ शैब्य भी है। पराक्रमी युधामन्यु, उत्तमौजा और सुभद्रा का पुत्र [अभिमन्यु] भी है । द्रौपदी के पाँच पुत्र भी हैं, जो सभी वास्तव में महारथी हैं ।
व्याख्यान के अनुसार, दुर्योधन पांडवों की सेना देखकर भीष्म पितामह के स्थान पर सबसे पहले आचार्य द्रोण के पास क्यों गया, और द्रोणाचार्य को उकसाने के लिए उनकी क्या स्थिति उत्तरदायी थी?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार द्रोणाचार्य पांडवों से घृणा नहीं करते थे, बल्कि अर्जुन से उनका अगाध स्नेह था। इसके अतिरिक्त, भीष्म पितामह युद्ध छोड़कर जाने की धमकी नहीं दे रहे थे, बल्कि वे अपनी प्रतिज्ञा के कारण कौरवों की ओर से सेनापति बनकर लड़ रहे थे।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि द्रोणाचार्य अर्थ (धन) के कारण दुर्योधन से बंधे हुए वेतनभोगी उपाध्याय थे, इसलिए दुर्योधन उन्हें कूटनीति से उकसा सकता था। इसके विपरीत, भीष्म पितामह वयोवृद्ध, अत्यंत हठी व दृढ़-प्रतिज्ञ थे और दुर्योधन के दबाव में आने वाले व्यक्ति नहीं थे।
दुर्योधन द्वारा पांडवों की सेना के वीरों की तुलना में केवल भीम और अर्जुन का ही मुख्य रूप से उल्लेख करने और उनकी सेना को 'महती' (बड़ी) कहने के पीछे क्या दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक कारण था?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि संख्याबल में कौरवों की सेना पांडवों की सेना से बड़ी थी, पांडवों की नहीं। इसके अलावा, दुर्योधन भीम और अर्जुन को अपने पक्ष में मिलाने का प्रयास नहीं कर रहा था, बल्कि द्रोणाचार्य के सामने उनके पराक्रम का उल्लेख करके द्रोणाचार्य को युद्ध के लिए उकसा रहा था।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार युद्ध केवल संख्या से नहीं बल्कि उत्साह, योग्यता और संकल्प से लड़ा जाता है। दुर्योधन को अपनी ईर्ष्या के कारण पांडवों का पराक्रम और बड़ा दिख रहा था, और उसका मुख्य भय भीम (जिसने प्रतिशोध की भयानक प्रतिज्ञा की थी) तथा अर्जुन (जो दिव्य अस्त्रों से सुसज्जित महारथी थे) से था।