भ. गी. 1.8
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥
अनुवाद
[यहाँ] आप, भीष्म, कर्ण, युद्ध में विजयी कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण, और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा [ हैं ]।
[यहाँ] आप, भीष्म, कर्ण, युद्ध में विजयी कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण, और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा [ हैं ]।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार द्रोणाचार्य पांडवों से घृणा नहीं करते थे, बल्कि अर्जुन से उनका अगाध स्नेह था। इसके अतिरिक्त, भीष्म पितामह युद्ध छोड़कर जाने की धमकी नहीं दे रहे थे, बल्कि वे अपनी प्रतिज्ञा के कारण कौरवों की ओर से सेनापति बनकर लड़ रहे थे।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि द्रोणाचार्य अर्थ (धन) के कारण दुर्योधन से बंधे हुए वेतनभोगी उपाध्याय थे, इसलिए दुर्योधन उन्हें कूटनीति से उकसा सकता था। इसके विपरीत, भीष्म पितामह वयोवृद्ध, अत्यंत हठी व दृढ़-प्रतिज्ञ थे और दुर्योधन के दबाव में आने वाले व्यक्ति नहीं थे।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि संख्याबल में कौरवों की सेना पांडवों की सेना से बड़ी थी, पांडवों की नहीं। इसके अलावा, दुर्योधन भीम और अर्जुन को अपने पक्ष में मिलाने का प्रयास नहीं कर रहा था, बल्कि द्रोणाचार्य के सामने उनके पराक्रम का उल्लेख करके द्रोणाचार्य को युद्ध के लिए उकसा रहा था।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार युद्ध केवल संख्या से नहीं बल्कि उत्साह, योग्यता और संकल्प से लड़ा जाता है। दुर्योधन को अपनी ईर्ष्या के कारण पांडवों का पराक्रम और बड़ा दिख रहा था, और उसका मुख्य भय भीम (जिसने प्रतिशोध की भयानक प्रतिज्ञा की थी) तथा अर्जुन (जो दिव्य अस्त्रों से सुसज्जित महारथी थे) से था।
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