भ. गी. 11.29

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥

अनुवाद

जिस प्रकार पतंगे अपने विनाश के लिए तीव्र वेग से प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार ये लोग भी अपने विनाश के लिए तीव्र वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

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