विश्वरूप-दर्शनयोग

इस अध्याय में पचपन श्लोक हैं, जिस में आठ सञ्जय के द्वारा, तेंतीस अर्जुन के द्वारा और चौदह भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा बोले गए हैं । दसवें अध्याय में, अर्जुन को भगवान की विशेष कृपा की अनुभूति हुई । इस अध्याय में विस्मय के कारण, अर्जुन श्रीकृष्ण से अपने विश्वरूप को प्रकट करने की विनती करता है (१-४) । श्रीकृष्ण अर्जुन की विनती को स्वीकार करते हैं तथा उसे दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे कि वह उनके विश्वरूप (५-८) का दर्शन कर सके । (अर्जुन के श्रीकृष्ण के प्रति मैत्रीभाव को विस्मृत कराने के लिए दिव्यदृष्टि दी अतः वह दर्शनार्थ सक्षम बनें ।)।

सञ्जय ने श्रीकृष्ण के विश्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि, वह सहस्र सूर्य के समान देदीप्यमान तेज है तथा उनके अनन्त मुख, हाथ और पाद (९-१४) हैं । इस अद्भुत, परन्तु भयभीत रूप को देखकर अर्जुन आश्चर्यचकित हो उठा । वह सोलह श्लोकों (१५-३०) में, उसे जो कुछ भी दृष्टिगोचर हुआ, इस का वर्णन करता है, तत्पश्चात् श्रीकृष्ण से पूछता है कि इस भयानक रूप को धारण करने का उनका प्रयोजन क्या है । श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि वे मृत्युरूपी कालावतार हैं, जो समस्त एकत्र योद्धाओं का विनाश करने के लिए प्रकट हुए हैं । वे अर्जुन को युद्ध एवं शत्रुओं का दमन करने के लिए प्रेरित करते हैं और कहते हैं कि ये सभी शत्रु उनके द्वारा पूर्व में ही मारे जा चुके हैं (३२-३४) ।

सञ्जय परिस्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि, यह सुनकर भयभीत हुआ अर्जुन अपनी लड़खड़ाती हुई वाणी में श्रीकृष्ण (३५) को सम्बोधित करता है । वह उन की स्तुति करता है, उन्हें बारम्बार प्रणाम करता है, और पिछले दुर्व्यवहार के लिए क्षमा माँगता है, जब उसने श्रीकृष्ण की महिमा को जाने बिना, एक समान स्तर पर उनसे एक मित्र सा व्यवहार किया था । अर्जुन यह घोषित करता है कि कोई भी श्रीकृष्ण के समान या उनसे श्रेष्ठ नहीं है और वे अन्य सभी देवताओं के द्वारा भी पूज्य हैं । वह श्रीकृष्ण से अपने दुर्व्यवहार को क्षमा करने की याचना करता है, जैसे एक स्नेही माता-पिता एक लाडले पुत्र के दुर्व्यवहार को क्षमा करते हैं, एक मित्र अन्य मित्र को, और एक प्रेमी अपनी प्रेयसी को क्षमा करता है (३६-४४) । अन्त में, अर्जुन श्रीकृष्ण से अपने चतुर्भूज रूप को (४५-४६) प्रकट करने के लिए विनती करता है । अर्जुन से प्रसन्न होकर, श्रीकृष्ण उसे अपना चतुर्भूज रूप दिखाते हैं और तत्पश्चात् अपने मूल मानव रूप (४७-४९) को प्रकट करते हैं । यह देखकर अर्जुन, शान्ति और प्रसन्नता का अनुभव करता है (५१) । श्रीकृष्ण तब अर्जुन को सूचित करते हैं कि उनका विश्वरूप सहजता से नहीं देखा जा सकता है । उसे केवल उनके प्रति भक्ति से ही देखा जा सकता है । श्रीकृष्ण निष्कर्ष देते हैं कि उनकी सेवा में रत भक्त सभी लौकिक आसक्तियों से मुक्त एवं निर्वैर होकर उन्हें (५२-५५) प्राप्त करता है ।

सभी श्लोक

  1. श्लोक 1अर्जुन ने कहा: आत्मा के विषय में उस परम गोपनीय ज्ञान [के श्रवण] से, जिसे आपने मुझ पर अनुग्रह करके कहा है, मेरा मोह पूर्णतः दूर हो गया है।
  2. श्लोक 2हे कमलनयन! मैंने आपसे समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय के विषय में तथा आपकी अक्षय महिमा के विषय में विस्तारपूर्वक सुना है।
  3. श्लोक 3हे परमेश्वर! आपने अपने विषय में जैसा वर्णन किया है, आप ठीक वैसे ही हैं। हे परम पुरुष! मैं आपके ऐश्वर्यमय रूप का दर्शन करना चाहता हूँ।
  4. श्लोक 4हे प्रभु ! यदि आप यह मानते हैं कि आपका वह अविनाशी रूप मेरे द्वारा देखा जा सकता है, तो हे योगेश्वर! मुझे उसका दर्शन कराइए।
  5. श्लोक 5श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! मेरे सैकड़ों और हजारों दिव्य रूपों को देखो, जो अनेक प्रकार के तथा विभिन्न रंगों और आकृतियों वाले हैं।
  6. श्लोक 6हे भरतवंशी! [मेरे ऐश्वर्यमय रूप में] बारह आदित्यों, आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों तथा उनचास मरुतों को देखो। और उन अनेक अद्भुत रूपों को भी देखो, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया है।
  7. श्लोक 7हे गुडाकेश! अब मेरे इस शरीर में एक ही स्थान पर स्थित समस्त चर और अचर जगत् को देखो, और जो कुछ भी तुम देखना चाहते हो, उसे भी देखो।
  8. श्लोक 8किन्तु तुम मुझे अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ। मेरे ऐश्वर्यमय रूप को देखो।
  9. श्लोक 9सञ्जय ने कहा: हे राजन्! इस प्रकार कहकर महान् योगेश्वर हरि ने पार्थ को अपना परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया।
  10. श्लोक 10-11[अर्जुन ने भगवान् के विश्वरूप को] अनेक मुखों और नेत्रों से युक्त, असंख्य अद्भुत दृश्यों से युक्त, अनगिनत दिव्य आभूषणों से अलंकृत, अनेक उठाए हुए दिव्य आयुधों को धारण किए हुए, दिव्य मालाओं और वस्त्रों से सुशोभित, दिव्य सुगन्धों से अनुलेपित, समस्त आश्चर्यों से पूर्ण, तेजोमय, अनन्त तथा सर्वतोमुख देखा।
  11. श्लोक 12यदि आकाश में एक साथ हजार सूर्यों की प्रभा प्रकट हो जाए, तो वह कुछ अंश तक उनके विश्वरूप की प्रभा के समान हो सकती है।
  12. श्लोक 13तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देवताओं के स्वामी के शरीर में सम्पूर्ण जगत् को उसके विविध विभागों सहित एक ही स्थान पर स्थित देखा।
  13. श्लोक 14इसके पश्चात् विस्मय से आविष्ट और रोमहर्षित अर्जुन ने सिर झुकाकर भगवान् को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा।
  14. श्लोक 15अर्जुन ने कहा: हे प्रभु ! मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं को, विविध प्रकार के प्राणियों के समुदायों को, कमलासन पर स्थित ब्रह्मा को, शिव को, समस्त ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।
  15. श्लोक 16हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको सर्वत्र अनन्त रूप में देख रहा हूँ, जिसकी असंख्य भुजाएँ, उदर, मुख और नेत्र हैं। फिर भी मैं आपके न अन्त को, न मध्य को और न ही आदि को देख पा रहा हूँ।
  16. श्लोक 17मैं आपको सर्वत्र मुकुट, गदा और चक्र से सुशोभित देख रहा हूँ, जो महान् तेज से दीप्तिमान हैं, चारों ओर प्रकाश बिखेर रहे हैं, जिनका दर्शन करना अत्यन्त कठिन है, जिनकी प्रभा सूर्य और प्रज्वलित अग्नि के समान है, और जो अपरिमेय हैं।
  17. श्लोक 18मेरे मत में आप परम अक्षर ब्रह्म तथा [मोक्ष की अभिलाषा रखने वालों के द्वारा] ज्ञेय तत्त्व हैं। आप इस जगत् के परम आश्रय हैं। आप अविनाशी हैं तथा सनातन धर्म के रक्षक हैं। आप सनातन परम पुरुष हैं।
  18. श्लोक 19मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र-सूर्यरूपी नेत्रों वाले, तथा प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले देख रहा हूँ, जो अपनी ही प्रभा से इस जगत् को तप्त कर रहे हैं।
  19. श्लोक 20हे महात्मन्! स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य का यह समस्त अन्तरिक्ष तथा सभी दिशाएँ केवल आपसे ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और भयानक रूप को देखकर तीनों लोक अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं।
  20. श्लोक 21देवताओं के ये समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं। उनमें से कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं, और महर्षियों तथा सिद्धों के समुदाय “स्वस्ति” कहकर उत्कृष्ट स्तोत्रों द्वारा आपकी प्रशंसा कर रहे हैं।
  21. श्लोक 22रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वदेव, दो अश्विनीकुमार, मरुत, पितर, तथा गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और सिद्धों के समुदाय—ये सभी ही आपको आश्चर्यचकित होकर देख रहे हैं।
  22. श्लोक 23हे महाबाहु! आपके इस विशाल रूप को, जो असंख्य मुखों और नेत्रों से युक्त है, जिसकी अनन्त भुजाएँ, जाँघें और चरण हैं, जिसमें अनेक उदर हैं और असंख्य भयानक दाँत हैं, देखकर लोक और मैं भी विस्मयाकुल हो रहे हैं।
  23. श्लोक 24हे विष्णु! आपके उस रूप को देखकर, जो आकाश को स्पर्श कर रहा है, जो तेज से पूर्ण है, जो अनेक रंगों से युक्त है, जिसके मुख खुले हुए हैं और जिसके प्रज्वलित विशाल नेत्र हैं, मेरा हृदय भय से व्याकुल हो गया है, और मैं न धैर्य पा रहा हूँ और न ही शान्ति।
  24. श्लोक 25आपके उन मुखों को, जो भयानक दाँतों से युक्त हैं और प्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित हैं, देखकर मैं दिशाओं को पहचान नहीं पा रहा हूँ और मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। हे देवेश! हे जगन्निवास! [मुझ पर] कृपा करें।
  25. श्लोक 26-27धृतराष्ट्र के ये सभी पुत्र, राजाओं के समुदायों सहित, तथा भीष्म, द्रोण और कर्ण, और हमारी ओर के प्रमुख योद्धा भी, आपके उन भयानक मुखों की ओर तीव्र गति से बढ़ते हुए उनमें प्रवेश कर रहे हैं, जो विकराल दाँतों से युक्त हैं। उनमें से कुछ योद्धाओं के चूर्णित मस्तक आपके दाँतों के बीच फँसे हुए दिखाई दे रहे हैं।
  26. श्लोक 28जिस प्रकार नदियों की असंख्य जलधाराएँ केवल समुद्र की ओर वेगपूर्वक बहती हैं, उसी प्रकार ये नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
  27. श्लोक 29जिस प्रकार पतंगे अपने विनाश के लिए तीव्र वेग से प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार ये लोग भी अपने विनाश के लिए तीव्र वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
  28. श्लोक 30हे विष्णु! आप अपने प्रज्वलित मुखों से इन सभी लोगों को निगलते हुए उन्हें चारों ओर से चाट रहे हैं। आपका प्रचण्ड तेज सम्पूर्ण जगत् को अपनी प्रभा से भरकर तपा रहा है।
  29. श्लोक 31हे उग्ररूप! कृपया मुझे बताइए कि आप कौन हैं। हे देवश्रेष्ठ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, कृपया प्रसन्न हों। मैं आपको, जो आदि पुरुष हैं, जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपके प्रयोजन को नहीं समझ पा रहा हूँ।
  30. श्लोक 32श्री भगवान् ने कहा: मैं काल हूँ, लोकों का महान् संहारक। मैं इन लोगों का विनाश करने के लिए यहाँ प्रवृत्त हूँ। तुम्हारे [उन्हें मारने] के बिना भी शत्रुपक्ष के ये सभी योद्धा जीवित नहीं रहेंगे।
  31. श्लोक 33इसलिए तुम उठो, यश प्राप्त करो, अपने शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग करो। ये योद्धा मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाची*! तुम तो केवल निमित्त बनो।
  32. श्लोक 34द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य महान् योद्धाओं को मारो, जो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। व्याकुल मत हो। युद्ध करो, और तुम युद्ध में अपने शत्रुओं को पराजित करोगे।
  33. श्लोक 35सञ्जय ने कहा: श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर काँपते हुए अर्जुन ने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके उसने गद्गद वाणी से कृष्ण से पुनः कहा।
  34. श्लोक 36अर्जुन ने कहा: हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपकी महिमा के संकीर्तन से जगत् आनन्दित और प्रेममय हो जाता है, भयभीत राक्षस सभी दिशाओं में भाग जाते हैं, और सिद्धों के सभी समुदाय आपको नमस्कार करते हैं।
  35. श्लोक 37हे महात्मन्! वे आपको नमस्कार क्यों न करें? आप तो ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि आप उनके भी आदिकारण हैं। हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप वह अविनाशी ब्रह्म हैं, जो कारण और कार्य से परे है।
  36. श्लोक 38आप आदिदेव हैं, अनादि परम पुरुष हैं। आप इस जगत् के परम आश्रय हैं। आप ज्ञाता हैं, ज्ञेय हैं, और गुणातीत स्वरूप भी हैं। हे अनन्तरूप! यह जगत् आपसे व्याप्त है।
  37. श्लोक 39आप वायु हैं, यम हैं, अग्नि हैं, वरुण हैं, चन्द्र हैं, समस्त प्राणियों के पितामह (ब्रह्मा) हैं, और प्रपितामह [अर्थात् ब्रह्मा के भी पिता] हैं। आपको सहस्रों बार नमस्कार है, आपको पुनः पुनः नमस्कार है, आपको बारम्बार नमस्कार है।
  38. श्लोक 40हे सर्वव्यापी! आपको आगे से और पीछे से नमस्कार है, आपको सभी ही दिशाओं से नमस्कार है। आप अनन्त सामर्थ्य और अपरिमेय पराक्रम से युक्त हैं। आप सब कुछ व्याप्त करते हैं, इसलिए आप सब कुछ हैं।
  39. श्लोक 41-42आपकी इस महिमा से अनभिज्ञ होकर और आपको अपना मित्र समझकर, मैंने प्रमादवश अथवा प्रेमवश ही “हे कृष्ण! हे यादव! हे सखा!” कहकर आपसे धृष्टतापूर्वक बातें कही होंगी। हे अच्युत! खेलते समय, विश्राम करते समय, साथ बैठते समय अथवा भोजन करते समय, चाहे अकेले में या अन्य लोगों के सामने, मैंने परिहास में आपका अनादर किया हो। उस सबके लिए मैं आपसे, जो अप्रमेय हैं, क्षमा याचना करता हूँ।
  40. श्लोक 43आप इस चराचर जगत् के पिता हैं, सबसे अधिक पूजनीय हैं, गुरु हैं और सबसे महान् हैं। हे अप्रतिम प्रभाव वाले प्रभु! तीनों लोकों में भी आपके समान कोई नहीं है, फिर आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है?
  41. श्लोक 44इसलिए, हे प्रभु! मैं प्रणाम करके और शरीर को दण्डवत् झुकाकर विनती करता हूँ कि आप, जो मेरे पूजनीय स्वामी हैं, प्रसन्न हों। जैसे पिता अपने पुत्र के, जैसे मित्र अपने मित्र के, अथवा जैसे प्रिय अपने प्रियजन के [अपराधों को क्षमा करता है], वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा करें।
  42. श्लोक 45मैं आपके उस विश्वरूप को देखकर अत्यन्त हर्षित हूँ, जिसे पहले कभी नहीं देखा गया था, फिर भी मेरा मन भय से अत्यन्त व्याकुल हो रहा है। हे प्रभु! हे देवेश! कृपया मुझे वही रूप [अपना चतुर्भुज रूप] दिखाइए। हे जगन्निवास! मुझ पर प्रसन्न हों।
  43. श्लोक 46मैं आपको पूर्ववत् मुकुट से सुशोभित तथा हाथों में गदा और चक्र धारण किए हुए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहु! हे विश्वरूप! कृपया वही चतुर्भुज रूप धारण कीजिए।
  44. श्लोक 47श्री भगवान् ने कहा: हे अर्जुन! तुम पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी अन्तरङ्ग-शक्ति के द्वारा तुम्हें यह परम रूप दिखाया है, जो तेजोमय, विश्वात्मक, अनन्त और आद्य है। तुम्हारे अतिरिक्त इस रूप को पहले किसी ने नहीं देखा है।
  45. श्लोक 48हे कुरुओं के महान् वीर! इस मर्त्यलोक में तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी मुझे इस रूप में न वेदों के पाठ से, न यज्ञों के अनुष्ठान से, न शास्त्राध्ययन से, न दान से, न वैदिक कर्मों से और न ही कठोर तपस्याओं से देख सकता है।
  46. श्लोक 49मेरे ऐसे भयानक रूप को देखकर न व्याकुल हो, न भ्रमित हो। भय से रहित और प्रसन्नचित्त होकर मेरे उसी [मानुष] रूप को पुनः देखो।
  47. श्लोक 50सञ्जय ने कहा: अर्जुन से इस प्रकार कहकर श्रीकृष्ण ने पुनः अपना मानुष रूप दिखाया। [उस] महात्मा ने पूर्ववत् अपना सौम्य रूप धारण करके भय से व्याकुल अर्जुन को सान्त्वना दी।
  48. श्लोक 51अर्जुन ने कहा: हे जनार्दन! आपके इस सौम्य मानुष रूप को देखकर मेरा चित्त अब स्थिर हो गया है, और मैं अपनी स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त हो गया हूँ।
  49. श्लोक 52श्री भगवान् ने कहा: मेरे जिस रूप को तुमने देखा है उसे देखना अत्यन्त दुर्लभ है। इस रूप के दर्शन के देवता भी सदा अभिलाषी हैं।
  50. श्लोक 53जैसे तुमने मुझे देखा है, उस प्रकार मैं न वेदों के अध्ययन से, न तपस्याओं से, न दान से और न ही यज्ञों से देखा जा सकता हूँ।
  51. श्लोक 54हे अर्जुन! हे परंतप! किन्तु अनन्य भक्ति के द्वारा मैं इसी रूप में तत्त्वतः जाना जा सकता हूँ, देखा जा सकता हूँ, और मुझमें प्रवेश हो सकता है।
  52. श्लोक 55हे पाण्डुपुत्र! जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे परम लक्ष्य मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है, और समस्त प्राणियों के प्रति वैरभाव से रहित है, वह मुझे प्राप्त करता है।

प्रश्न

इस अध्याय के मुख्य प्रश्न