भ. गी. 11.52

श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥

अनुवाद

श्री भगवान् ने कहा: मेरे जिस रूप को तुमने देखा है उसे देखना अत्यन्त दुर्लभ है। इस रूप के दर्शन के देवता भी सदा अभिलाषी हैं।

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SiddhantaBhagavad Gītā readerClosed — Satisfied

पूछा गया 7 Oct 2026, 10:00

पाठक का प्रश्न

Which form is being talked about by sri krishna here which even the devatas are eager to see?

  1. व्यवस्थापक का उत्तर

    His viśvarūpa