भ. गी. 12.2
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥
अनुवाद
श्री भगवान् ने कहा: जिनका मन मुझमें आविष्ट है, जो सदा मुझसे युक्त रहते हैं, और जो दिव्य श्रद्धा से सम्पन्न होकर मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं योग के सर्वोत्तम ज्ञाता मानता हूँ।