भक्तियोग
गत अध्याय (५, ६ और ८) में, भगवान श्रीकृष्ण ने रूप व गुण रहित निर्विशेष परम तत्त्व को विस्तार से बताया । तत्पश्चात् उन्होंने, सर्वनाम अहम् (मैं) और मम (मेरा) के पुनः-पुनः प्रयोग द्वारा, सविशेष परम तत्त्व को परम आराध्य देव के रूप में उसी परम ईश्वर की सेवा पर महत्त्व दिया, जो अनन्त पारलौकिक रूप और गुण से सम्पन्न हैं । अन्त में गत अध्याय ११ में उन्होंने अनन्या भक्ति और उसके शुभ परिणाम की महिमा बताई ।
वर्तमान अध्याय में, श्रीकृष्ण भक्ति के सिद्धान्तों का वर्णन करते हैं । इसमें २० श्लोक हैं, जिसमें एक श्लोक अर्जुन के द्वारा और अन्य श्रीकृष्ण के द्वारा कहे गए हैं । पूर्व अध्याय में, श्रीकृष्ण की विभूति को जानने के पश्चात्, इस अध्याय का आरम्भ अर्जुन के इस प्रश्न से होता है कि: "उन भक्तों में जो आपको सदा समर्पित है एवं अनन्य भाव से आपकी पूजा करते हैं, या जो अव्यक्त अविनाशी ब्रह्म की पूजा करते हैं, उनमें से योग के सर्वोच्च साधक कौन हैं" ? (१) श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं, "जिनका मन मुझ में आविष्ट है, जो सदैव मेरे साथ एकाकार हैं, जो मेरी पूजा करते हैं, तथा जो शास्त्रीय श्रद्धायुक्त हैं, उन्हें मैं योग का सर्वोच्च साधक मानता हूँ ।" अन्य साधक भी अन्ततोगत्वा मुझे (निर्विशेष ब्रह्म को) ही प्राप्त करेंगे परन्तु यह मार्ग अति कष्टदायक है क्योंकि अव्यक्त निर्विशेष ब्रह्म पर मन को स्थिर करना अति कठिन है । श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि "जिन लोगों का मन अव्यक्त से जुड़ा हुआ है वे अधिक कष्ट पाते हैं क्योंकि अव्यक्त का लक्ष्य देहधारियों द्वारा कठिनाई से प्राप्त किया जाता है" (२-५) ।
श्रीकृष्ण व्यक्तिगत रूप से उनकी सेवा-पूजा करने वाले भक्तों का संसार सागर से उद्धार करते हैं । अतः वे उनमें ही मन व बुद्धि से रत रहने की सलाह देते हैं (६-७) । जो साधक ऐसा करने में असमर्थ हैं, उन्हें वह अपना मन उन पर स्थिर करने के लिए नियमित अभ्यास की सलाह देते हैं । तथापि, यदि कोई इस अभ्यास के लिए भी असमर्थ है, तो उसे केवल भगवान के लिए कर्म करना चाहिए । जो ऐसा करने में भी असमर्थ है उसे अपने सभी कर्मफल को त्याग देना चाहिए । इस प्रकार श्रीक़ृष्ण विभिन्न साधकों की क्षमता और पात्रता के अनुसार वैकल्पिक अभ्यास प्रदान करते हैं ।
इस अध्याय के अन्तिम श्लोकों (१३-१९) में श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्तों के गुणों का वर्णन करते हैं एवं पुनः-पुनः इस बात की पुष्टि करते हैं, कि वे उन्हें बहुत प्रिय हैं। उन्होंने यह कहते हुए निष्कर्ष दिया कि "तथापि, जो मेरे द्वारा वर्णित इस धर्ममय अमृत पथ का (विवेक से) निष्ठापूर्वक पालन करते हैं, तथा जो अनन्य रूप से मत्परायण व श्रद्धावान भक्त हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय है ।" (२०) ।
सभी श्लोक
- श्लोक 1अर्जुन ने पूछा: इस प्रकार सदा आपके प्रति समर्पित रहकर केवल आपकी उपासना करने वाले भक्त और अव्यक्त, अक्षर ब्रह्म की उपासना करने वाले, इनमें योग के सर्वोत्तम ज्ञाता कौन हैं?
- श्लोक 2श्री भगवान् ने कहा: जिनका मन मुझमें आविष्ट है, जो सदा मुझसे युक्त रहते हैं, और जो दिव्य श्रद्धा से सम्पन्न होकर मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं योग के सर्वोत्तम ज्ञाता मानता हूँ।
- श्लोक 3-4किन्तु जो अपनी सारी इन्द्रियों को संयमित कर समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखते हैं, जो समस्त प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, और जो उस अनिर्वचनीय, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, अपरिवर्तनशील, अचल, नित्य तथा अक्षर ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे भी मुझे प्राप्त करते हैं।
- श्लोक 5जिनका मन अव्यक्त में आसक्त है, उनका क्लेश अधिक है, क्योंकि देहधारियों द्वारा अव्यक्त लक्ष्य कठिनाई से प्राप्त होता है।
- श्लोक 6-7किन्तु हे पार्थ! जो अपने समस्त कर्म मुझे समर्पित कर मुझमें आसक्त हैं, और जो केवल अनन्य भक्ति-योग के द्वारा मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन व्यक्तियों का, जिनका मन मुझमें आविष्ट है, मैं मृत्युरूप संसार-सागर से शीघ्र ही उद्धार कर देता हूँ।
- श्लोक 8अपना मन केवल मुझमें स्थिर करो और अपनी बुद्धि को मुझमें आविष्ट होने दो। इसके पश्चात् तुम केवल मुझमें ही निवास करोगे। इसमें कोई सन्देह नहीं है।
- श्लोक 9किन्तु हे धनञ्जय! यदि तुम अपना मन मुझमें स्थिर नहीं कर सकते, तो पुनः-पुनः अभ्यास से मुझे प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
- श्लोक 10तुम यदि अभ्यास करने में भी असमर्थ हो, तो मेरे लिए कर्म करने में तत्पर रहो। केवल मेरे लिए कर्म करते हुए भी तुम सिद्धि प्राप्त कर लोगे।
- श्लोक 11किन्तु यदि तुम यह भी नहीं कर सकते, तो मेरे योग का आश्रय लेकर और आत्मसंयमी होकर अपने समस्त कर्मों के फल मुझे अर्पित करो।
- श्लोक 12मेरे प्रति जागृकता निश्चय ही [जागृकता से रहित] अभ्यास-साधना से श्रेष्ठ है, और ध्यान जागृकता से श्रेष्ठ है, क्योंकि ध्यान के द्वारा कर्मफलों का त्याग स्वतः हो जाता है, और तत्पश्चात् फल की इच्छा के त्याग से शान्ति प्राप्त होती है।
- श्लोक 13-14मेरा भक्त, जो समस्त प्राणियों के प्रति वैरभाव से रहित है, जो मैत्रीपूर्ण और करुणामय है, जो “मैं” और “मेरा” की भावना से रहित है, जो सुख-दुःख में समभाव रखता है, जो क्षमाशील, सन्तुष्ट, नित्य भक्ति-योग में संलग्न, आत्मसंयमी तथा दृढ़निश्चयी है, और जिसका मन तथा बुद्धि मुझे समर्पित हैं, वह मुझे प्रिय है।
- श्लोक 15जो किसी को उद्विग्न नहीं करता, जो दूसरों से उद्विग्न नहीं होता, और जो हर्ष, अमर्ष, भय तथा उद्वेग से मुक्त है, ऐसा व्यक्ति भी मुझे प्रिय है।
- श्लोक 16मेरा वह भक्त, जो इच्छारहित, [भीतर और बाहर से] शुद्ध, दक्ष, निष्पक्ष, तथा व्यथारहित है, और जो [भक्ति के प्रतिकूल] समस्त आरम्भों का त्याग कर देता है, मुझे प्रिय है।
- श्लोक 17जो [न प्रिय वस्तु को पाकर] हर्षित होता है, न [अप्रिय से] द्वेष करता है, न शोक करता है, न आकांक्षा रखता है, जो [भक्ति से रहित] समस्त शुभ और अशुभ कर्मों का त्याग कर देता है, और जो भक्ति से सम्पन्न है, वह मुझे प्रिय है।
- श्लोक 18-19जो शत्रु और मित्र तथा मान और अपमान को समान दृष्टि से देखता है, जो शीत और उष्ण तथा सुख और दुःख में सम है, जो आसक्ति से रहित है, निन्दा और स्तुति में समभाव रखता है, मननशील है, जो अपने आप प्राप्त हो जाए उसमें सन्तुष्ट रहता है, जो किसी भी निवास-स्थान के प्रति ममत्व से रहित है, और जिसका मन स्थिर है, ऐसा भक्तिमान मुझे प्रिय है।
- श्लोक 20और जो श्रद्धालु भक्त मेरे द्वारा बताए गए इस अमृतमय धर्म का पालन करते हैं तथा जिनका लक्ष्य केवल मैं ही हूँ, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।