भ. गी. 13.1

श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥

अनुवाद

श्री भगवान् ने कहा: हे कुन्तीपुत्र! इस शरीर को क्षेत्र कहते हैं, और जो इस क्षेत्र को जानता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले क्षेत्रज्ञ कहते हैं।

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