प्रकृति-पुरुष-विभागयोग

भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर (क्षेत्र) और आत्मा के मध्य में भेद को समझाकर अपनी शिक्षाओं का प्रारम्भ किया । अध्याय २ में, आत्मा के विभिन्न लक्षणों का निरूपण किया गया था । व्यक्तिगत आत्मा क्षेत्रज्ञ (शाब्दिक रूप से, "क्षेत्र का ज्ञाता") है, वह स्वदेह का मुख्य और अपने जगत का गौण ज्ञाता है । इस अध्याय में, परमात्मा, जो समस्त क्षेत्र के ज्ञाता अर्थात् क्षेत्रज्ञ हैं, के प्रकृति तथा कार्यकलाप के विषय में बताया गया है ।

गत अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा था कि जो लोग अविनाशी, अव्यक्त ब्रह्म की पूजा करते हैं, उन के लिए लक्ष्य (परम पद) प्राप्त करना उनके उन भक्तों की तुलना में अधिक कठिन है, जो केवल उनकी ही पूजा करते हैं (१२.५) । ज्ञानयोग का मार्ग कठिन है । गीता के छह अध्यायों के तीन विभागों के तीसरे विभाग (अध्याय १३-१८) में तेरहवाँ अध्याय प्रथम है, जहाँ श्रीकृष्ण ने ज्ञानयोग का विस्तार से वर्णन किया है । इस अध्याय में चौंतीस श्लोक हैं, जो सभी श्रीकृष्ण के द्वारा कहे गए हैं । यहाँ ज्ञान का विशेष रूप से अर्थ है चेतना वस्तु (आत्मा) तथा देह और तद् सम्बन्धित भौतिक विस्तार का भेद । इस ज्ञान के वर्णन मे श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि कैसे विभिन्न भौतिक पदार्थ से इस देह का निर्माण किया गया है ।

आरम्भ में, श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा, क्षेत्र का ज्ञाता) के मध्य के भेद को दर्शाते हैं । क्षेत्रज्ञ दो प्रकार के होते हैं – जीव (आत्मा) और परमात्मा (२) । जिस में षड् विकार (जन्मादि) होता है वह क्षेत्र (शरीर) है (३) । श्रीकृष्ण क्रमानुसार क्षेत्र (५-६), ज्ञान (७-११) और ज्ञेय (१२-१८) का वर्णन करते हैं ।

प्रकृति (भौतिक प्रकृति) और पुरुष (जीव) का संयोजन अनादि (१९) है । प्रकृति और उसके विकारों के साथ भौतिक प्रकृति का आनन्द लेने का प्रयत्न करते हुए पुरुष सुख और दुःख का अनुभव करता है । प्राकृतिक गुणों का संसर्ग ही पुरुष के विभिन्न योनियों में जन्म का कारण है (२१) । देह में परमात्मा साक्षीरूप हैं जो भर्ता, भोक्ता व महेश्वर और परम पुरुष भी हैं । जो पुरुष और प्रकृति को उसके गुणों सहित जान जाता है वह मुक्त हो जाता है ।

जो कुछ भी उत्त्पन्न होता है, चाहे वह चर या अचर हो, वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ (२६) का संयोजन ही होता है । श्रीकृष्ण बताते हैं कि परमात्मा की उपस्थिति प्रत्येक वस्तु में है । जो परमात्मा को सर्वत्र सभी वस्तु में देखता है और यह जानता है कि वास्तव में सभी कार्य प्रकृति के द्वारा होते हैं, वह कर्तापन के अहङ्कार को त्याग देता है, तथा परम ब्रह्म (२७-३०) को प्राप्त करता है । श्रीकृष्ण तब परमात्मा (३१-३३) के लक्षणों का वर्णन करते हैं । जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के मध्य के भेद को जानते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं (३४) ।

सभी श्लोक

  1. श्लोक 0अर्जुन ने पूछा: हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय के विषय में जानना चाहता हूँ।
  2. श्लोक 1श्री भगवान् ने कहा: हे कुन्तीपुत्र! इस शरीर को क्षेत्र कहते हैं, और जो इस क्षेत्र को जानता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
  3. श्लोक 2हे भरतवंशी! समस्त क्षेत्रों में स्थित क्षेत्रज्ञ मुझे भी [व्यक्तिगत क्षेत्रज्ञों के अतिरिक्त] जानो। मेरा मत है कि क्षेत्र [शरीर] और [इन दोनों] क्षेत्रज्ञों [व्यक्तिगत जीव और सर्वज्ञ भगवान्] का ज्ञान ही [यथार्थ] ज्ञान है।
  4. श्लोक 3क्षेत्र क्या है, उसके मूलभूत लक्षण क्या हैं, उसके विकार क्या हैं, वह किससे उत्पन्न हुआ है, और उसका विशिष्ट स्वरूप क्या है? इसके अतिरिक्त, क्षेत्रज्ञ कौन है और उसकी स्वाभाविक शक्तियाँ क्या हैं? यह सब मुझसे संक्षेप में सुनो।
  5. श्लोक 4[क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ से सम्बन्धित इस तत्त्व का] ऋषियों ने अनेक प्रकार से गान किया है। विभिन्न वैदिक छन्दों में भी इसका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया है तथा ब्रह्मसूत्रों के युक्तियुक्त और निश्चयात्मक वचनों द्वारा भी इसका प्रतिपादन किया गया है।
  6. श्लोक 5-6पञ्च महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त [प्रकृति], दस इन्द्रियाँ तथा मन, पाँच इन्द्रिय-विषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात [तत्त्वों का समूह, जिसे शरीर कहा जाता है], चेतना तथा धृति—इन सबको, उनके विकारों सहित, संक्षेप में क्षेत्र कहा गया है।
  7. श्लोक 7-11अमानिता, अदम्भता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, सद्गुरु की सेवा, [भीतर और बाहर से] शुद्धता, स्थिरता, शरीर का संयम, इन्द्रिय-विषयों के प्रति वैराग्य, देह में अहङ्कार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दुःखद दोषों का चिन्तन, पुत्र, पत्नी, घर आदि के प्रति अनासक्ति तथा अनभिमान, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में निरन्तर समभाव, केवल मुझमें अनन्य तन्मयता से अव्यभिचारिणी शुद्ध भक्ति, एकान्त स्थान में निवास, सांसारिक लोगों से अनासक्ति, अध्यात्म के अभ्यास में निरन्तरता, तथा परम तत्त्व के ज्ञान के प्रयोजन पर विचार—इन सबको ज्ञान कहा गया है। इससे भिन्न जो कुछ भी है, वह अज्ञान है।
  8. श्लोक 12अब मैं ज्ञेय का वर्णन करूँगा, जिसे जानकर व्यक्ति अमरत्व प्राप्त करता है। वह ब्रह्म, जो अनादि है और मेरे अधीन है, न कारण कहलाता है न कार्य।
  9. श्लोक 13वह [ब्रह्म] सर्वत्र हाथों और चरणों के साथ, चारों ओर नेत्रों, सिरों और मुखों के साथ, तथा सभी दिशाओं में कानों के साथ समस्त जगत् को व्याप्त करके स्थित है।
  10. श्लोक 14ब्रह्म समस्त इन्द्रियों तथा उनके गुणात्मक विषयों को प्रकाशित करता है, फिर भी वह सभी [भौतिक] इन्द्रियों से रहित है। वह अनासक्त है, फिर भी सबका पालक है। वह [भौतिक] गुणों से रहित है, फिर भी [दिव्य] गुणों का स्वामी है।
  11. श्लोक 15ब्रह्म समस्त प्राणियों के भीतर भी है और बाहर भी। वह चल भी है और अचल भी। सूक्ष्म होने के कारण वह अविज्ञेय है। दूर होने पर भी वह अत्यन्त निकट है।
  12. श्लोक 16वह किसी भी प्रकार के विभाजन से रहित है, फिर भी समस्त प्राणियों में विभक्त-सा स्थित है। उसे समस्त प्राणियों का पालक, संहारक तथा उनकी उत्पन्न करने वाला समझना चाहिए।
  13. श्लोक 17वह समस्त प्रकाशमान वस्तुओं का प्रकाश है और उसे अन्धकार [अज्ञान] से परे कहते हैं। वही ज्ञान है, ज्ञेय है, तथा ज्ञान से गम्य है [जागृत चेतना से साक्षात्कार करने योग्य है]। वह समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित है।
  14. श्लोक 18इस प्रकार क्षेत्र [शरीर], ज्ञान और ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन हुआ। इसे जानकर मेरा भक्त मेरे प्रति प्रेम का अधिकारी हो जाता है।
  15. श्लोक 19यह जानो कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं। यह भी जान लो कि समस्त विकार तथा भौतिक गुणों से उत्पन्न पदार्थ प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं।
  16. श्लोक 20शरीर [कार्य] और इन्द्रियों [निकटवर्ती कारण] के कर्तृत्व के सम्बन्ध में प्रकृति को कारण कहते हैं। सुख और दुःख के भोक्तृत्व के विषय में पुरुष को कारण कहते हैं।
  17. श्लोक 21प्रकृति [शरीर] में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों का अनुभव करता है। भौतिक विषयों [गुणों से उत्पन्न पदार्थों] के प्रति आसक्ति ही उसके उच्च अथवा निम्न योनियों में जन्म लेने का कारण है।
  18. श्लोक 22इस शरीर में एक अन्य पुरुष भी है, जिसे साक्षी, अनुमन्ता, धारक, रक्षक, महेश्वर तथा परमात्मा भी कहा जाता है।
  19. श्लोक 23जो इस प्रकार गुणों सहित पुरुष और प्रकृति को जानता है, वह अपनी वर्तमान जीवन-स्थिति चाहे जैसी भी हो, पुनः जन्म नहीं लेता।
  20. श्लोक 24कुछ लोग ध्यान [परमात्मा के ध्यान] के द्वारा हृदय में स्वयंप्रकाशित आत्मा [परमात्मा] का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करते हैं। अन्य लोग सांख्य-ज्ञान के मार्ग से, कुछ अन्य अष्टाङ्ग-योग से, और कुछ अन्य निष्काम कर्म (कर्म-योग) से ऐसा करते हैं।
  21. श्लोक 25अन्य लोग, जो इन विधियों से अपरिचित हैं, दूसरों [गुरुओं] से इनके विषय में सुनकर उपासना करते हैं। वे भी श्रवण-प्रक्रिया में निष्ठावान् होकर निश्चय ही मृत्यु का अतिक्रमण कर जाते हैं।
  22. श्लोक 26हे भरतश्रेष्ठ! जो भी प्राणी उत्पन्न होता है, चाहे वह जङ्गम हो अथवा स्थावर, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुआ जानो।
  23. श्लोक 27जो परमेश्वर को समस्त प्राणियों में समान रूप से स्थित तथा नश्वरों में अविनाशी देखता है, वही वास्तव में देखता है।
  24. श्लोक 28निश्चय ही, ईश्वर को सर्वत्र समान रूप से स्थित देखकर मनुष्य मन के द्वारा अपना पतन नहीं करता और परिणामस्वरूप परम गति को प्राप्त करता है।
  25. श्लोक 29जो देखता है कि समस्त कर्म केवल प्रकृति द्वारा ही किए जाते हैं और आत्मा अकर्ता है, वही वास्तव में देखता है।
  26. श्लोक 30जब कोई समस्त प्राणियों की विविधता को एक ही [प्रकृति] में स्थित देखता है और यह भी देखता है कि उनका विस्तार उसी एक से हुआ है, तब वह ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।
  27. श्लोक 31हे कुन्तीपुत्र! यह अविनाशी परमात्मा अनादि और भौतिक गुणों से रहित होने के कारण शरीर में स्थित होने पर भी न कर्म करता है और न ही [शरीर द्वारा किए गए कर्मों से] लिप्त होता है।
  28. श्लोक 32जिस प्रकार सर्वव्यापी आकाश अपनी सूक्ष्मता के कारण दूषित नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा भी, यद्यपि समस्त शरीरों में स्थित है, उन शरीरों के गुणों से लिप्त नहीं होती।
  29. श्लोक 33हे भरतवंशी! जिस प्रकार एक ही सूर्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करती है।
  30. श्लोक 34जो इस प्रकार विवेकरूपी नेत्र के द्वारा शरीर और शरीर के ज्ञाता के बीच के भेद को, तथा जीव के प्रकृति से मुक्त होने के उपाय को जानते हैं, वे परम गति को प्राप्त करते हैं।