भ. गी. 13.7-11

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥

अनुवाद

अमानिता, अदम्भता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, सद्गुरु की सेवा, [भीतर और बाहर से] शुद्धता, स्थिरता, शरीर का संयम, इन्द्रिय-विषयों के प्रति वैराग्य, देह में अहङ्कार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दुःखद दोषों का चिन्तन, पुत्र, पत्नी, घर आदि के प्रति अनासक्ति तथा अनभिमान, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में निरन्तर समभाव, केवल मुझमें अनन्य तन्मयता से अव्यभिचारिणी शुद्ध भक्ति, एकान्त स्थान में निवास, सांसारिक लोगों से अनासक्ति, अध्यात्म के अभ्यास में निरन्तरता, तथा परम तत्त्व के ज्ञान के प्रयोजन पर विचार—इन सबको ज्ञान कहा गया है। इससे भिन्न जो कुछ भी है, वह अज्ञान है।

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।