भ. गी. 2.32
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥
अनुवाद
हे पार्थ ! वे क्षत्रिय सुखी हैं जिन्हें ऐसे युद्ध का अवसर प्राप्त होता है । स्वयं ही उत्पन्न हुआ ऐसा सौभाग्य स्वर्ग का खुला द्वार है ।
हे पार्थ ! वे क्षत्रिय सुखी हैं जिन्हें ऐसे युद्ध का अवसर प्राप्त होता है । स्वयं ही उत्पन्न हुआ ऐसा सौभाग्य स्वर्ग का खुला द्वार है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार स्वभाव केवल वर्तमान शिक्षा या वातावरण से नहीं बनता; और नदी के प्रवाह के विरुद्ध तैरना तो स्वभाव के प्रतिकूल (विरुद्ध) कार्य करने का उदाहरण है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि हमारे स्वभाव के पीछे दो मुख्य कारण हैं—पूर्व जन्म की वासनाएँ और बाल्यकाल में मिले संस्कार। स्वभाव के अनुकूल कार्य करना नदी के प्रवाह के साथ तैरने के समान सहज और सुगम होता है, जबकि इसके विपरीत कार्य करने में अत्यधिक निरर्थक प्रयास करना पड़ता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि क्षत्रिय के लिए युद्ध का मैदान छोड़ना सम्मान या मोक्ष का साधन नहीं है, बल्कि इससे केवल पाप, अपकीर्ति और नरक की प्राप्ति होती है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि धर्मयुद्ध का त्याग करने से अर्जुन के स्वधर्म और कीर्ति दोनों का विनाश होगा। इसके अलावा, उस पर पूर्ण निर्भर रहने वाले पांडव भाइयों के साथ विश्वासघात करने का पाप लगेगा और एक श्रेष्ठ पुरुष/नेता होने के कारण समाज में गलत परंपरा का प्रर्वतन होगा।
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