साङ्ख्ययोग
दूसरे अध्याय के प्रारम्भ में सञ्जय, अर्जुन को दुःख से अभिभूत देखकर श्रीकृष्ण की जो प्रतिक्रिया हुई, उसका वर्णन करते हैं । इस अध्याय में बहत्तर श्लोक हैं, जिनमें तीन सञ्जय ने, आठ अर्जुन ने तथा इकसठ श्लोक श्रीकृष्ण ने कहे हैं । युद्धभूमि में अर्जुन के कायरतापूर्ण व्यवहार को देखकर, श्रीकृष्ण पहले आश्चर्य व्यक्त करते हैं । वे अर्जुन के प्रति बिना कोई सहानुभूति दिखाए उसे आदेश देते हैं कि वह उठे और अपनी क्षुद्र दुर्बलता को त्यागे (१-३) । अर्जुन अपने पक्ष का बचाव यह कहते हुए करता है कि, "इस जगत में उन महान सम्माननीय पुरुषों की हत्या करने के बदले भिक्षा पर जीना श्रेयकारी होगा, क्योंकि उन सभी की हत्या के पश्चात् प्राप्त सभी भोग, धन और इन्द्रिय सुख उनके रक्त से दूषित हुए होंगे" (४-५) ।
(यद्यपि) अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया, लेकिन उसमें अपने निर्णय के बारे में संदेह भी दिखाई देता है। यह देखकर कि श्रीकृष्ण उसकी लड़ने की अनिच्छा का समर्थन नहीं कर रहे, अपितु उसका उपहास कर रहे हैं, उसका मन सन्देह से भर जाता है (६) । वह श्रीकृष्ण की शरण में जाता है और उन्हें अपना गुरु बनने के लिए निवेदन करता है (७) । विडम्बना यह है कि अपनी शरणागति के तुरन्त पश्चात् ही अर्जुन युद्ध न करने के सङ्कल्प की घोषणा करता है (९) ।
श्रीकृष्ण अपनी शिक्षा का आरम्भ अर्जुन को उलाहना देकर करते हैं । वे अर्जुन से कहते हैं कि, "तुम बुद्धिमानी का दिखावा कर रहे हो, जबकि वास्तव में तुम शोकग्रस्त हो" (११) । श्रीकृष्ण सर्वप्रथम यह स्पष्ट करते हैं कि देह और आत्मा एक दूसरे से पूर्णतः भिन्न हैं । देह सामयिक, सीमित और नश्वर है, जबकि आत्मा शाश्वत, वास्तविक और अविनाशी है । अतः नश्वर वस्तु के विनाश का शोक तथा अविनाशी वस्तु को स्थित रखने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए, यही विवेक है । ऐसा विवेक कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों ही योगों में आवश्यक है । जब कोई व्यक्ति आत्मा और देह में भेद कर लेता है, तब उसे मुक्ति (सांसारिक बन्धन से छुटकारा) पाने की जिज्ञासा होती है । यहां तक कि स्वर्गेच्छा भी इन दोनों के भेद के ज्ञान की अपेक्षा रखती है । अतः श्रीकृष्ण अपने निर्देशों का आरम्भ इस विवेक की चर्चा से करते हैं, जो श्लोक सङ्ख्या तीस पर्यन्त जारी रहती है ।
यहाँ दार्शनिक शब्दावली के बजाय श्रीकृष्ण सरल शब्दों का उपयोग करते हैं जिससे लोग इस विषय को सुगमता से समझ सकें । यहाँ पर विचार यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर की साक्षात् अनुभूति प्राप्त करने का अधिकार है, क्योंकि मानव देह हमें विशेष रूप से इसी उद्देश्य के लिए प्रदान किया गया है, जो एक शाश्वत चेतन इकाई के रूप में स्वयं की क्षमता की संपूर्ण पूर्ति है । अतः प्रत्येक मनुष्य इस विवेक के महत्त्व को समझकर ईश्वर की अनुभूति कर सकता है।
इस प्रकरण में श्रीकृष्ण ने "बुद्धि" शब्द का प्रयोग नहीं किया है । सत्य को असत्य से, अविनाशी को नाशवान से, शाश्वत को सामयिक से और आत्मा को देह से भिन्न दिखाने के लिए केवल इस विवेक की आवश्यकता है । जैसे प्रकृति और पुरुष (आत्मा) दोनों अनादि हैं (जैसा कि श्रीकृष्ण अध्याय १३, श्लोक १९-२० में कहते हैं), वैसे ही विवेक की क्षमता भी अनादि है, जो सत्य को असत्य से भिन्न करती है । ईश्वर ने सभी प्राणियों को विवेक दिया है जो बुद्धि में प्रकट होता है । यहां तक कि पक्षी और पशु भी सहज रूप से जानते हैं कि क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए एवं क्या गर्म है और क्या ठंडा है । फिर भी, आध्यात्मिक बुद्धि के विषय में वे विवेक-रहित हैं । विशेष रूप से सिर्फ़ मनुष्य ही इस विवेक से सम्पन्न है जो उसे जन्म और मृत्यु के बन्धन (संसार) से मुक्त कर सकता है तथा शाश्वत शान्ति एवं आनंद (मुक्ति) की ओर ले जा सकता है। विवेक जागृत होने पर जब व्यक्ति आत्मा और देह का अन्तर समझने में सक्षम होता है, तब वह इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि सहित इस जगत की अस्थायी वस्तुओं का मोह त्याग देता है । परिणामस्वरूप उसकी बुद्धि शुद्ध और सन्तुलित हो जाती है ।
आत्मा के स्वरूप का विशद वर्णन समाप्त कर, श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि युद्ध ही क्षत्रिय का धर्म है। उनका तर्क है कि यदि अर्जुन युद्ध नहीं करेगा तो उसके शत्रु उसका उपहास करेंगे । इसलिए अपनी प्रतिष्ठा के लिए भी उसे स्थिर मन से युद्ध करना चाहिए । (३१-३८)
आगे प्रकरण में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "मैंने साङ्ख्य योग [वैराग्य-मार्ग, जो देह और आत्मा की भेदबुद्धि पर आधारित है] के सम्बन्ध में तुम्हें ज्ञान दिया। अब निष्काम कर्मयोग [भगवान को अर्पित निःस्वार्थ कर्म का मार्ग] के सम्बन्ध में सुनो । इस ज्ञान से युक्त होकर तुम सभी कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाओगे.” (३९) । कर्मयोग में बुद्धि एक ही ध्येय पर स्थिर रहती है । (४१) । जब लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए दृढ़ सङ्कल्प करते हैं तब अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ उनके लिए कोई भी बाधा नहीं उत्पन्न करती हैं, एवं इस प्रकार वे समता प्राप्त कर लेते हैं । जब कोई ईश्वर को साधने का सङ्कल्प करता है तब संसार के प्रति उसकी आसक्ति और आकर्षण लुप्त होने लगते हैं । सुख, समृद्धि व प्रतिष्ठा के प्रति आसक्ति, दृढ़ सङ्कल्प की प्राप्ति में मुख्य बाधा है (४४) । वस्तुओं, ऐश्वर्य, समृद्धि या सम्बन्धों से कोई बाधा नहीं है, अपितु उन सब में आसक्ति से ही बाधा है । अतः इन सब को त्यागना नहीं है, परन्तु उनमें हुई आसक्ति को त्यागना है । यह विषय पुनः-पुनः भगवद्गीता में आता है ।
कर्ममार्ग में मन के सन्तुलन पर जोर देकर श्रीकृष्ण अर्जुन से अनुरोध करते हैं कि वह मन की समता के साथ कर्त्तव्य-पालन करे । वे आदेश करते हैं कि "केवल कर्म करने पर तुम्हारा अधिकार है, परंतु कर्मफल पर कभी भी नहीं । अतः [स्वतन्त्र कर्तृत्व का दावा करके] तुम कर्मफल का हेतु मत बनो और इस के परिणाम हेतु कर्म न करने में भी आसक्ति मत रखो (अर्थात् निष्क्रिय मत बनो) (४७) । योग में दृढ़ता से स्थित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करो" (४८) । श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि फल की इच्छा से किया गया कर्तव्य बुद्धियोग (अर्थात् निष्काम कर्मयोग) से निम्न श्रेणी का है: "फल के उद्देश्य से किया गया सकाम कर्म वास्तव में बुद्धियोग (अर्थात् निष्काम कर्मयोग) से निम्न श्रेणी का है । अतः इस बुद्धि का आश्रय लो । जो कर्मफल के लिए कार्य करते हैं वे कृपण हैं" (४९) । आगे वे निर्देश करते हैं कि "इस जीवन में मन के सन्तुलन से सम्पन्न व्यक्ति पाप और पुण्य दोनों कर्मों का त्याग कर देता है, अतः योग के लिये प्रयत्न करो । योग [अर्थात् समता से निष्काम कर्म करना] कर्म में निपुणता है (५०) । इन सभी श्लोक का सार यह है कि व्यक्ति को अपने कर्मों के प्रति सचेत रहना चाहिए और कर्मफल के प्रति आसक्त नहीं होना चाहिए।
इसका ध्यान रखना चाहिए कि ज्ञानयोग में देह और आत्मा का भेद (विवेक) मुख्य है; भक्तियोग में शरणागति और श्रद्धा प्रधान है; जबकि कर्मयोग में दृढ़ बुद्धि मुख्य है । तब अर्जुन स्थिरबुद्धि वाले व्यक्ति के लक्षणों के विषय में पूछते हैं: ऐसा समाधिस्थ व्यक्ति जगत में कैसे व्यवहार करता है, तथा एकान्त में कैसे कार्य करता है (५४) ? श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर शेष अध्याय (५५-७२) में देते हैं ।
श्रीकृष्ण निर्देश देते हैं कि जब किसी व्यक्ति का मन सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है । जब कोई व्यक्ति विषयों का ध्यान करता है तब वह उनमें आसक्त हो जाता है, जिससे उनकी प्राप्ति की इच्छा होती है, जिसका परिणाम क्रोध है । क्रोध उसे भ्रमित कर देता है । फलतः स्मृति की हानि होती है, जिससे उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है । व्यक्ति इस प्रकार संपूर्णतया नष्ट हो जाता है । श्रीकृष्ण इन्द्रिय-नियन्त्रण पर विशेष बल देते हैं । जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण पा लिया है, वह उस समुद्र की भाँति है, जो कि स्वयं में प्रवेश करने वाली असङ्ख्य नदियों के द्वारा भरे जाने पर भी, अपनी सीमा में ही रहता है । ऐसा व्यक्ति परम शान्ति और भौतिक प्रकृति के बन्धन से मुक्ति प्राप्त करता है ।
सभी श्लोक
- श्लोक 1सञ्जय ने कहा – कृपा से आविष्ट, आकुलता एवं आँसुओं से भरी हुई आँखों वाले, विषाद कर रहे अर्जुन को मधुसूदन ने ये वाक्य बोले ।
- श्लोक 2श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन ! ऐसे विषम अवसर पर यह मल [विषाद] तुम्हारे* अन्दर कहाँ से उपस्थित हो गया ? यह कुलीन व्यक्ति के लिए अनुचित, स्वर्गप्राप्ति के लिए अनुपयुक्त, और अपकीर्ति की ओर ले जाने वाला है ।
- श्लोक 3हे पार्थ (अर्जुन) ! नपुंसकता को प्राप्त मत हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता । हे शत्रुओं को सन्ताप देने वाले (परन्तप ) ! हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए उठो ।
- श्लोक 4अर्जुन ने कहा – हे मधुसूदन ! हे शत्रुओं के संहारक ! मैं भीष्म और द्रोण पर, जो मेरे लिये पूजनीय हैं, इस युद्ध में बाणों से पलटवार कैसे करूँ ?
- श्लोक 5इस संसार में गुरुजनों एवं महानुभावों की हत्या की तुलना में तो भिक्षा में प्राप्त भोजन पर जीवित रहना ही श्रेयस्कर है। अन्यथा इस संसार में अपने गुरुजनों की हत्या से भोग करने वाले जो धन एवं भोग-विलास की वस्तुएँ हम प्राप्त करेंगे, वे निश्चित रूप से उनके रक्त से दूषित हो जाएँगी।
- श्लोक 6और हम नहीं जानते कि हमारे लिए क्या बेहतर होगा — उनपर विजय प्राप्त करना या उनका हमपर विजय प्राप्त करना ? वही धृतराष्ट्र के पुत्र, जिनकी हत्या करके हम हम जीना नहीं चाहेंगे, वे आज सीधे हमारे सामने खड़े हैं ।
- श्लोक 7मेरा स्वभाव हृदय की दुर्बलता के दोष से वशीभूत हो गया है और मेरा मन अपने धर्म को लेकर भ्रमित हो गया है । मैं आपसे पूछता हूँ कि आप कृपया मुझे निश्चित रूप से बताएँ कि कौन सा कार्य मेरे लिए सबसे कल्याणकारी है । मैं आपका शिष्य हूँ और मैं आपकी शरण में आया हूँ । कृपया मुझे शिक्षा दीजिए ।
- श्लोक 8वास्तव में, भले ही हमें इस पृथ्वी पर एक शत्रुरहित, समृद्ध राज्य और यहाँ तक कि देवताओं पर सम्प्रभुता भी प्राप्त हो जाए, मैं ऐसा कुछ भी नहीं देख रहा हूँ जो इन्द्रियों को पीड़ित करने वाले इस शोक को दूर कर सके ।
- श्लोक 9सञ्जय ने कहा – हृषिकेश से इस प्रकार कहने के पश्चात्, शत्रुओं को ताप देने वाले गुडाकेश ने गोविन्द से कहा, "मैं युद्ध नहीं करूँगा," और चुप हो गये ।
- श्लोक 10हे भरतवंशी ! तब श्रीकृष्ण ने, मानो मुस्कुराते हुए, दोनों सेनाओं के मध्य विषाद करने वाले अर्जुन से ये वचन कहे ।
- श्लोक 11श्री भगवान ने कहा – तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं हैं, ओर फिर भी विद्वानों की तरह बात कर रहे हो। जो वास्तव में पण्डित हैं, वे न तो मृत के लिए और न ही जीवित के लिए शोक करते हैं।
- श्लोक 12ऐसा कोई समय नहीं था जब मेरा, तुम्हारा एवं इनमें से किसी भी राजा का अस्तित्व नहीं था । भविष्य में भी हममें से किसी का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होगा ।
- श्लोक 13जैसे आत्मा के देह में ही बाल्य, यौवन, और फिर वृद्धावस्था होती है, वैसे ही आत्मा को [मृत्यु के बाद] दूसरे देह की प्राप्ति होती है । धीर व्यक्ति इससे मोहित नहीं होता ।
- श्लोक 14हे कुन्तीपुत्र ! इन्द्रियों का अपने विषयों के साथ स्पर्श शीत और गर्मी तथा सुख और दुःख की भावनाओं को उत्पन्न करता है । वे अस्थायी हैं, वे आती और जाती हैं । अतः हे भरतवंशी ! उन्हें सहन करो ।
- श्लोक 15हे पुरूषश्रेष्ठ ! जो धीर व्यक्ति इन इन्द्रिय-स्पर्शों से व्यथित नहीं होता है, सुख और दुःख में समान रूप से स्थित रहता है, वह निश्चय ही अमरत्व का पात्र है ।
- श्लोक 16असत् का कोई अस्तित्व नहीं है, और सत् का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता है । इन दोनों [सिद्धान्तों] का निष्कर्ष तत्त्वदर्शियों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव किया गया है ।
- श्लोक 17किंतु जिससे यह सम्पूर्ण देह व्याप्त है, उसे तुम अविनाशी जानो । इस अव्यय [आत्मा] का विनाश कोई नहीं कर सकता है ।
- श्लोक 18नित्य, अविनाशी और अप्रमेय देही के इन सभी देहों को नाशवान कहा गया है । अतः, हे भरतवंशी ! युद्ध करो ।
- श्लोक 19जो इसे (आत्मा को) हत्यारा मानता है और जो उसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों अज्ञानी हैं, क्योंकि आत्मा न हत्या करता है न उसकी हत्या होती है ।
- श्लोक 20यह न कभी जन्म लेता है और न ही मरता है। यह एक बार होने के पश्चात् कभी भी पुनः होने वाला नहीं है । यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है । शरीर की हत्या होने पर उस (आत्मा) की हत्या नहीं होती है ।
- श्लोक 21हे पार्थ ! जो व्यक्ति आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा, और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मार सकता है या मरवा सकता है ?
- श्लोक 22जिस प्रकार व्यक्ति जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र ग्रहण करता है, उसी प्रकार देही (आत्मा) जीर्ण शरीरों को त्यागकर अन्य नए शरीरों में प्रवेश करता है ।
- श्लोक 23न शस्त्र इसे (आत्मा को) काट सकते हैं, न ही अग्नि इसे जला सकती है; न ही जल इसे भीगा सकता है और न ही वायु इसे सुखा सकती है ।
- श्लोक 24इसे काटा या जलाया नहीं जा सकता । इसे गीला नहीं किया जा सकता और सुखाया नहीं जा सकता । यह नित्य, सर्वगत, स्थिर, अचल और सनातन है ।
- श्लोक 25इसे (आत्मा को) अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी कहा जाता है । अतः इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए ।
- श्लोक 26परन्तु हे महाबाहो ! यदि तुम इस आत्मा को नित्य जन्म लेने वाला और मरने वाला मानते हो, तो भी तुम्हें इस विषय में शोक नहीं करना चाहिये ।
- श्लोक 27जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरता है उसका जन्म निश्चित है । अतः तुम जिसे रोक नहीं सकते उसपर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए ।
- श्लोक 28हे भरतवंशी ! सभी प्राणी जन्म के पूर्व अप्रकट होते हैं, जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि में प्रकट होते हैं तथा मृत्यु के बाद पुनः अप्रकट हो जाते हैं । इस विषय में शोक क्या करना ?
- श्लोक 29कोई इसे (आत्मा को) आश्चर्यमय मानता है, कोई इसे आश्चर्यमय कहता है, कोई इसे आश्चर्यमय सुनता है, जबकि अन्य व्यक्ति सुनकर भी इसे बिलकुल भी नहीं समझ पाते ।
- श्लोक 30हे भरतवंशी ! समस्त प्राणियों के देह में वास करने वाला देही (आत्मा) नित्य अविनाशी है, अतः तुम्हें किसी के लिए शोक नहीं करना चाहिए ।
- श्लोक 31और फिर, अपने कर्तव्य (धर्म) को ध्यान में रखते हुए तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से अधिक श्रेयस्कर कुछ भी नहीं है ।
- श्लोक 32हे पार्थ ! वे क्षत्रिय सुखी हैं जिन्हें ऐसे युद्ध का अवसर प्राप्त होता है । स्वयं ही उत्पन्न हुआ ऐसा सौभाग्य स्वर्ग का खुला द्वार है ।
- श्लोक 33परन्तु यदि तुम यह धर्मयुद्ध नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को त्यागकर पाप को प्राप्त करोगे ।
- श्लोक 34और लोग सदैव तुम्हारी अपकीर्ति की चर्चा करते रहेंगे, और सम्मानित पुरुष के लिये अपकीर्ति मृत्यु से भी निकृष्ट होती है ।
- श्लोक 35महारथी लोग यही मानेंगे कि तुम भय के कारण रणभूमि से भाग गये । वास्तव में जो तुम्हें इतना अधिक मान देते थे वे ही तुम्हें तुच्छ समझेंगे ।
- श्लोक 36और तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करके तुम्हें अनेक अपशब्द कहेंगे । निश्चय ही, इससे अधिक दुःखद और क्या हो सकता है ?
- श्लोक 37यदि तुम [युद्ध करते हुए] मारे गए तो स्वर्ग को प्राप्त करोगे और यदि तुम विजयी हुए तो पृथ्वी का भोग करोगे । अतः हे कुन्तीपुत्र ! युद्ध का दृढ़ निश्चय करके खड़े हो जाओ ।
- श्लोक 38सुख-दुःख, लाभ-हानि, विजय-पराजय को समान मानकर युद्ध में लग जाओ । इस प्रकार तुम्हें पाप नहीं लगेगा ।
- श्लोक 39हे पार्थ, मैंने यह ज्ञान तुम्हें साङ्ख्ययोग [शरीर और आत्मा के मध्य विवेक पर आधारित वैराग्य के मार्ग] के सम्बन्ध में कहा है । अब इसे कर्मयोग [ईश्वर को समर्पित निष्काम कर्म के मार्ग] के सम्बन्ध में सुनो । इस ज्ञान से युक्त होकर तुम कर्म के बन्धनों को पूरी तरह त्याग सकोगे ।
- श्लोक 40[कर्मयोग के] इस मार्ग पर अर्जित प्रगति का कोई नाश नहीं होता, और न ही विपरीत परिणाम प्राप्त करने की कोई सम्भावना होती है । इस धर्म का थोड़ा सा भी अभ्यास मनुष्य को [जन्म और मृत्यु के चक्र के] महान भय से बचा लेता है ।
- श्लोक 41हे कुरुवंशी, इस पथ पर बुद्धि एक ही लक्ष्य में एकाग्र होकर दृढ़ निश्चय वाली होती है, जबकि जिसका निश्चय नहीं है उसकी बुद्धि के सङ्कल्प असंख्य एवं अनेक शाखाओं में बँटे हुए होते हैं ।
- श्लोक 42-43हे पार्थ ! अविवेकी लोग जो वेदों में वर्णित अस्थायी लक्ष्यों में आसक्त हैं और यह दावा करते हैं कि वेदों का प्रयोजन इनके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, जिनमें भौतिक कामनाएँ भरी हुई हैं और जो स्वर्ग की प्राप्ति का सङ्कल्प रखते हैं, वे भोग और ऐश्वर्य प्राप्ति हेतु वेदों के अनेक विशेष अनुष्ठानों से सम्बन्धित पुष्पित शब्दों का उच्चारण करते हैं, जिनका परिणाम है पुनर्जन्म तथा कर्म चक्र का निरंतर चलते रहना ।
- श्लोक 44जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, तथा जिनके चित्त वेद के ऐसे पुष्पित शब्दों से मोहित हैं, उनकी बुद्धि* [परमेश्वर के] समाधि में स्थिर नहीं हो सकती ।
- श्लोक 45वेद के [मुख्य] विषय तीन गुणों से सम्बन्धित हैं । हे अर्जुन ! तुम तीन गुणों से मुक्त हो जाओ, द्वन्द से परे स्थित रहो, प्राप्ति और संरक्षण की चिन्ताओं से मुक्त हो जाओ । शाश्वत अस्तित्व में प्रतिष्ठित हो जाओ और आत्मस्थित हो जाओ।
- श्लोक 46छोटे जलाशय से जो उद्देश्य [पूरा हो सकता है], वह एक ही विशाल जलाशय से पूर्णरूप से [प्राप्त हो जाता है] । उसी प्रकार जो उद्देश्य सभी वेदों से प्राप्त करने योग्य है, वह एक आत्म-साक्षात्कारी ब्राह्मण द्वारा पूर्ण हो जाता है।
- श्लोक 47कर्म* करने तक ही तुम्हारा अधिकार सीमित है, परंतु कभी भी उसके फल पर नहीं । अतः तुम [स्वतन्त्र कर्तापन** का दावा करके] कर्मफल का कारण मत बनो और परिणामस्वरूप कर्म के न करने में भी आसक्त मत हो ।
- श्लोक 48हे धनञ्जय ! फल की इच्छा का परित्याग करके, सफलता व असफलता में सम रहते हुए, योग में दृढ़ होकर, तुम अपने कर्तव्यों का पालन करो । मन की इस समता को ही योग कहते हैं ।
- श्लोक 49हे धनञ्जय ! सकाम कर्म वास्तव में इस बुद्धि योग [निष्काम कर्म योग] से अत्यन्त निम्नश्रेणी का है । इस बुद्धि का आश्रय लो । जो फल की कामना से कर्म करते हैं, वे दयनीय हैं ।
- श्लोक 50मन की समता से सम्पन्न होकर व्यक्ति इस जीवन में पुण्य एवं पाप दोनों कर्मों को त्याग देता है । अतः योग [निष्काम कर्मयोग] के लिए प्रयत्न करो । समत्वयुक्त योग ही कर्म में कुशलता है* ।
- श्लोक 51जो बुद्धिमान व्यक्ति इस [निष्काम कर्मयोग] के ज्ञान से युक्त होते हैं, वे अपने कर्मों से उत्पन्न फलों का परित्याग करके जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं एवं समस्त दुःखों से परे पद को प्राप्त करते हैं ।
- श्लोक 52जब तुम्हारी बुद्धि मोहरुपी दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम (वेदों में वर्णित उन लौकिक सुखों) के प्रति उदासीन हो जाओगे जिनके विषय में तुमने पहले सुना है और जिनके विषय में सुनना शेष है ।
- श्लोक 53जब तुम्हारी बुद्धि, जो शास्त्र एवं संसार के विरोधी मतों से भ्रमित हो गई है, अविचल होते हुए [परमेश्वर की] दिव्य समाधि* में अडिग रुप से स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग की स्थिति को प्राप्त करोगे ।
- श्लोक 54अर्जुन ने पूछा – हे केशव ! जिस [ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त] व्यक्ति की बुद्धि दृढता से स्थिर है, और जो समाधि में स्थित है, उसके लक्षण क्या हैं ? स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, और कैसे चलता है ?
- श्लोक 55श्री भगवान् ने कहा – हे पार्थ ! जब व्यक्ति मन की समस्त तृष्णाओं को पूर्णतः त्याग देता है और आत्मा के स्वाभाविक आनंद से केवल आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है ।
- श्लोक 56जिसका मन दु:खों में भी अविचल रहता है, जो सुखों की लालसा नहीं करता है, तथा जो भौतिक आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त रहता है, वह स्थिरबुद्धि वाला मुनि कहलाता है ।
- श्लोक 57जो सभी विषयों के मध्य अनासक्त रहता है, जो न तो सौभाग्य की प्राप्ति पर हर्षित होता है और न ही दुर्भाग्य के आने पर द्वेष करता है, ऐसा व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला होता है ।
- श्लोक 58जब मुनि अपने सभी इंद्रियों को इंद्रिय-विषयों से इस प्रकार पूरी तरह खींच लेता है, जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने कचकडे़ (खोल) में समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है ।
- श्लोक 59यद्यपि संयम का अभ्यास करता हुआ व्यक्ति इंद्रियविषयों का त्याग कर दे, फिर भी उनमें उसकी आसक्ति बनी रहती है । परंतु जब उसे परब्रह्म [अर्थात् भगवान] का साक्षात्कार होता है, तब उसकी यह आसक्ति भी चली जाती है।
- श्लोक 60हे कुन्तीपुत्र ! उपद्रवी इंद्रियाँ मोक्षप्राप्ति के लिये प्रयत्नशील बुद्धिमान व्यक्ति के मन को भी अवश्य ही बलपूर्वक हर लेती हैं ।
- श्लोक 61जो योगी मेरे साथ [भक्ति में] युक्त है और केवल मेरा परायण है, उसे अपनी सभी इंद्रियों को संयमित करके बैठना चाहिये । जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, वह निःसंदेह स्थिर बुद्धि वाला होता है ।
- श्लोक 62इंद्रियविषयों का चिंतन करने से व्यक्ति में उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न हो जाती है । आसक्ति से इच्छा उत्पन्न हो जाती है और [अतृप्त] इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है ।
- श्लोक 63क्रोध से मोह उत्पन्न होता है और मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है । स्मृति के भ्रष्ट होने से विवेक नष्ट हो जाता है और जब विवेक नष्ट हो जाता है, तब व्यक्ति नष्ट हो जाता है ।
- श्लोक 64परन्तु आत्मसंयमी व्यक्ति की इन्द्रियाँ उसके वश में होती हैं । अतएव वह राग और द्वेश से मुक्त होता है। अपनी इन्द्रियों से इन्द्रियविषयों का अनुभव करते हुए भी वह मन की शान्ति प्राप्त करता है ।
- श्लोक 65जब व्यक्ति को मन की शान्ति प्राप्त हो जाती है तब उसके सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं । जिसका मन शान्त है, उसकी बुद्धि निश्चित रुप से अति शीघ्र [ईश्वर में] दृढता से स्थित हो जाती है ।
- श्लोक 66जिस व्यक्ति का मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, वह उचित विवेक विकसित नहीं कर सकता और न ही वह ईश्वर के प्रति सचेत* हो सकता है । जो ईश्वर के प्रति सचेत नहीं है, वह शान्ति प्राप्त नहीं कर सकता और मन की शान्ति के बिना कोई व्यक्ति सच्चा सुख कैसे प्राप्त कर सकता है ?
- श्लोक 67वास्तव में ऐसे व्यक्ति की विवेक-बुद्धि को भटकती हुई इन्द्रियों के पीछे चलने वाला मन उसी प्रकार हर लेता है, जैसे वायु जल पर नाव को उसके मार्ग से हटा देती है ।
- श्लोक 68अतः हे महाबाहो अर्जुन ! जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ अपने विषयों से पूर्णतः संयमित हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
- श्लोक 69संयमी व्यक्ति उस [आध्यात्मिक चेतना] के प्रति जाग्रत रहता है जो सभी बद्धजीवों के लिये रात्री* है । [इसी प्रकार] सभी बद्धजीव उस [भौतिकवादी चेतना] के प्रति जाग्रत रहते हैं जो साक्षात्कारी मुनि के लिये रात्री है ।
- श्लोक 70जैसे अनेक नदीयाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं, और समुद्र पूर्णतः भरा हुआ होने पर भी अपनी सीमा में स्थिर रहता है, उसी प्रकार जिस मुनि में समस्त भोग प्रवेश करते हैं [परन्तु उसके मन में विकार नहीं लाते], वह शान्ति प्राप्त करता है, न कि वह जो भोगों की लालसा करता है ।
- श्लोक 71जो व्यक्ति समस्त इच्छाओं को त्यागकर, लालसा से रहित होकर तथा ’मैं’ और ’मेरा’ की धारणाओं से मुक्त होकर जीवन जीता है, वह पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है ।
- श्लोक 72हे पार्थ ! यह ईश्वर-साक्षात्कार की अवस्था है । इसे प्राप्त करके व्यक्ति कभी मोहग्रस्त नहीं होता है । इस अवस्था में स्थित होकर, मृत्यु के समय भी व्यक्ति ब्रह्म में मोक्ष प्राप्त कर लेता है [अर्थात् परब्रह्म* के संग में बन्धनरहित होकर रहता है]।