भ. गी. 3.13

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

अनुवाद

जो पुण्यात्मा यज्ञ के अवशेष को ग्रहण करते हैं, वे अपने सभी दुष्कर्मों से मुक्त हो जाते हैं । परन्तु जो पापी केवल अपने ही सुख के लिए भोजन पकाते हैं, वे केवल बुरे कर्मफल के भागी होते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.१२ ("इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः...") में यज्ञ के बिना संसाधनों का उपभोग करने वाले को 'स्तेन' (चोर) क्यों कहा गया है, तथा बैंक क्लर्क व ऋषि लिखित का क्या दृष्टांत दिया गया है?

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