यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
अनुवाद
जो पुण्यात्मा यज्ञ के अवशेष को ग्रहण करते हैं, वे अपने सभी दुष्कर्मों से मुक्त हो जाते हैं । परन्तु जो पापी केवल अपने ही सुख के लिए भोजन पकाते हैं, वे केवल बुरे कर्मफल के भागी होते हैं ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.१२ ("इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः...") में यज्ञ के बिना संसाधनों का उपभोग करने वाले को 'स्तेन' (चोर) क्यों कहा गया है, तथा बैंक क्लर्क व ऋषि लिखित का क्या दृष्टांत दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार केवल सेंध लगाने वाला ही चोर नहीं होता, बल्कि अधिकृत वस्तु का मनमाने तरीके से अपने लिए भोग करने वाला भी चोर है [4–5]। बैंक क्लर्क द्वारा बैंक का पैसा इस्तेमाल करना अपराध है। ऋषि लिखित ने आम खाने को धर्मशास्त्र के अनुसार चोरी ही माना था [16–17]।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि प्रकृति द्वारा मिली वस्तुएँ हमारे उपयोग के लिए हैं परंतु मनमाने भोग के लिए नहीं [4–6]। जिस प्रकार बैंक क्लर्क धन का रक्षक होता है, उपभोक्ता नहीं; उसी प्रकार ईश्वर की दी हुई वस्तुओं को बिना यज्ञ (समर्पण/ऋण-मुक्ति) के भोगने वाला चोर (स्तेन) है। महाभारत में ऋषि लिखित ने अपने भाई हस्त की अनुमति के बिना आम खाने पर स्वयं को चोर मानकर राजा से हाथ कटवाने का दंड प्राप्त किया [15–18]।
भगवद्गीता के श्लोक ३.१३ ("यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः...") की व्याख्या के अनुसार मनुस्मृति में वर्णित 'अमृत' व 'विघस' का क्या अर्थ है, तथा केवल अपने लिए भोजन पकाने वाले को 'अघम्' (पाप) खाने वाला क्यों कहा गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि मनुस्मृति के अनुसार गृहस्थ को 'अमृताशी' और 'विघसाशी' होना चाहिए—अर्थात् यज्ञ-शेष (अमृत) और अतिथि-सेवा के बाद बचा अन्न (विघस) ही ग्रहण करना चाहिए [21–22]। जो केवल अपने लिए भोजन पकाता/कमाता है ('पचन्त्यात्मानकारणात्'), वह ऋग्वेद और गीता के अनुसार केवल पाप ही भक्षण करता है [21–22]। मनुष्य पर पाँच ऋण (ऋषि, देव, पितृ, भूत, नृ) होते हैं, जिनसे मुक्त होने के लिए पंच-महायज्ञ (अध्ययन, यज्ञ, श्राद्ध, बलि, अतिथि-सेवा) अनिवार्य हैं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'अमृत' और 'विघस' जड़ी-बूटियाँ नहीं बल्कि यज्ञ और अतिथि-सेवा के पश्चात बचा पवित्र अन्न है [21–22]। केवल अपने लिए पकाना पंच-ऋणों को समाप्त नहीं करता बल्कि व्यक्ति को पापी ('अघम्') बनाता है [21–23]।