कर्मयोग

इस अध्याय में तैंतालीस श्लोक हैं, जिनमें तीन अर्जुन के द्वारा और चालीस श्रीकृष्ण के द्वारा बोले गए हैं । जिस प्रकार, एक छात्र जो पूर्वाग्रहों और पूर्व-धारणाओं से भरा होता है, तथा उसे शिक्षक के द्वारा प्रस्तुत किए गए नए विचारों और सूचनाओं को समझने में कठिनाई होती है, ठीक उसी प्रकार अर्जुन, जिसने पहले ही युद्ध न करने का निश्चय कर लिया था, श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को पूरी तरह से समझ नहीं सका। अर्जुन को श्रीकृष्ण के शब्द भ्रमात्मक और अस्पष्ट लगे । अतः इस अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के द्वारा श्रीकृष्ण से अपने सन्देह का निवारण करने के लिए एक प्रश्न से होता है ।

श्रीकृष्ण ने संक्षेप में साङ्ख्य योग और कर्मयोग (निष्काम मार्ग) की व्याख्या की थी । अर्जुन, अब श्रीकृष्ण से पूछता है, "यदि आप निश्चला बुद्धि (प्राकृतिक गुणों से रहित) को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो आप मुझे क्यों इस घोर युद्ध को करने के लिए कहते हैं ?" अर्जुन पूछता है कि उसके लिए क्या हितकारी होगा - दिव्य ज्ञान प्राप्ति की साधना करना या कर्ममार्ग का पालन करना (१-२)?

उत्तर में, भगवान ज्ञानयोग और कर्मयोग के भेद को समझाना प्रारम्भ करते हैं । वे कर्ममार्ग से समत्त्व भाव (४-२९) प्राप्त करने की प्रक्रिया बताते हैं । आगे, वे कहते हैं कि कोई व्यक्ति एक क्षण के लिए भी निष्क्रिय नहीं रह सकता । व्यक्ति का स्वभाव ही उसे कार्य करने के लिए प्रेरित करता है । पाखण्डी बाह्यरूप से त्याग का प्रदर्शन करते हुए मन में भोगविलास की कामना रखता है । अतः व्यक्ति को अपना कर्त्तव्य करना चाहिए । कर्म अकर्मण्यता से श्रेष्ठ है (५-८) । वैदिक समाज में देवताओं को प्रसन्न करने के लिए, मन्त्रोच्चार के साथ-साथ यज्ञ या अग्नि में आहुति देने को बहुत महत्त्व दिया जाता था । श्रीकृष्ण यज्ञ के महत्त्व को समझाते हैं, और इसे कर्म या कर्त्तव्य से जोड़ते हैं । जो आत्मतृप्त है, सन्तुष्ट है, उसके पास कोई कर्त्तव्य करने के लिए नहीं है (९-१९) ।

जनक जैसे महान राजाओं ने कर्मयोग के माध्यम से सिद्धि प्राप्त की थी । समाज में उदाहरण स्थापित करने के लिए एक सिद्ध कर्मयोगी को भी अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, यद्यपि वह कार्य करने के लिए बाध्य नहीं है । इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वयं ही अपने व्यवहार को एक उदाहरण (२०-२४) के रूप में प्रस्तुत करते हैं । जो लोग अपने कर्मफलों में आसक्त होते हैं उन्हें कर्मत्यागने के लिए प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए । सभी कार्य प्रकृति के तीन गुणों से प्रेरित होते हैं, फिर भी मोहग्रस्त व्यक्ति स्वयं को कर्ता समझता है । ज्ञानी व्यक्ति तीन गुणों की प्रक्रिया से अवगत होने के कारण उनके प्रभाव में नहीं आता है (२५-२९) । श्रीकृष्ण अनुशंसा करते हैं कि, व्यक्ति को कामना और अहङ्कार से मुक्त होकर, विवेकपूर्ण दृष्टि से सभी कर्मों को उन्हें समर्पित कर देना चाहिए । ऐसा करते हुए, व्यक्ति को शान्त मन से कर्म करना चाहिए (३०) । श्रीकृष्ण अपनी शिक्षा का पालन करने के लाभ और ऐसा न करने पर हानि की घोषणा करते हैं (३१-३२) । अन्त में वे निष्कर्ष निकालते हैं कि "परधर्म को अच्छी प्रकार से निभाने की तुलना में, स्वधर्म को अपूर्णता से करना भी श्रेयकारी है । " (३५)

तब अर्जुन यह जिज्ञासा करता है कि व्यक्ति जान बूझकर अधर्म करने के लिए किस बाह्यशक्ति से प्रेरित होता है ? (३६) । श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं, "यह रजोगुण से उत्पन्न हुई भौतिक कामना है, जिसकी पूर्ति न होने पर ये क्रोध में परिणत हो जाती है, जो कि अतृप्त और अत्यधिक अशुभ है । इसे मुक्ति के मार्ग का शत्रु समझो" (३७) । वे कहते हैं कि यह शत्रु, भोग की इच्छा के रूप में साधक की इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर हावी हो जाता है और विवेक को ढँक देता है, एवं व्यक्ति को मूल उद्देश्य की प्राप्ति से विचलित करता है । अतः वे इन्द्रियाँ, मन और शरीर को नियन्त्रित करने तथा दृढ़ बुद्धि के माध्यम से इस कामनारूपी शत्रु को मारने का उपदेश देते हैं (४०-४३) ।

सभी श्लोक

  1. श्लोक 1अर्जुन ने पूछा – हे जनार्दन ! यदि आप (निर्गुण) निश्चयात्मिका बुद्धि को सकाम कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव ! आप मुझे इस घोर युद्ध में क्यों नियोजित कर रहे हैं ?
  2. श्लोक 2आप अपने विरोधाभासी शब्दों से मेरी बुद्धि को भ्रमित जैसा कर रहे हैं । कृपया निश्चय करके मुझे वह एक विधि बताइए जिससे मैं सर्वोच्च कल्याण प्राप्त कर सकूँ ।
  3. श्लोक 3श्रीभगवान् ने कहा - हे निष्पाप अर्जुन ! मैंने पूर्व ही इस संसार में उपलब्ध दो प्रकार की आध्यात्मिक निष्ठा का वर्णन किया है - ज्ञानी (सांख्ययोगी*) ज्ञान के मार्ग (ज्ञानयोग) से आगे बढ़ते हैं, जबकि कर्मयोगी निष्काम कर्म के मार्ग (कर्मयोग) से उन्नत होते हैं ।
  4. श्लोक 4नियत कर्मों का पालन किए बिना मनुष्य कर्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता है तथा अशुद्ध हृदय वाला व्यक्ति नियत कर्म के परित्याग करने मात्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता ।
  5. श्लोक 5वस्तुतः कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृतिजन्य गुण प्रत्येक व्यक्ति को असहाय होकर कर्म करने के लिए विवश कर देते हैं ।
  6. श्लोक 6जो मनुष्य बाहर से कर्मेन्द्रियों को (तथा ज्ञानेन्द्रियों को भी) संयमित करता है, परन्तु मन में इन्द्रियविषयों का स्मरण करता रहता है, उसकी बुद्धि भ्रमित है और वह मिथ्याचारी कहलाता है* ।
  7. श्लोक 7परन्तु हे अर्जुन ! जो मन के द्वारा इन्द्रियों को नियन्त्रित कर लेता है, जो कर्म के फलों में अनासक्त रहता है तथा जो कर्मेन्द्रियों (तथा ज्ञानेन्द्रियों) के द्वारा अपने नियत कर्तव्यों का पालन करता है, वह पुरुष अतिश्रेष्ठ है ।
  8. श्लोक 8अतः तुम अपने कर्मों को करो, क्योंकि कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है । इसके अतिरिक्त कर्म के बिना तुम्हारा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं हो सकता ।
  9. श्लोक 9भगवान् विष्णु को अर्पित होने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य सभी कर्म इस संसार में बन्धन का कारण हैं । अतएव हे कौन्तेय (अर्जुन), तुम (कर्म के) फलों में अनासक्त रहते हुए केवल भगवान् विष्णु के लिए कुशलतापूर्वक अपने कर्म करो।
  10. श्लोक 10सृष्टि के आरम्भ में जब ब्रह्मा ने यज्ञ* के सहित मानवजाति की सृष्टि की तब उन्होंने कहा, “इस यज्ञ से तुम समृद्ध होगे । यह तुम्हारी सभी इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो ।”
  11. श्लोक 11[ ब्रह्मा आगे कहते हैं - ] “इस यज्ञ के द्वारा देवताओं का पोषण करो, और [ ऐसा करने से ] देवता तुम पर कृपा करें । इस प्रकार पारस्परिक परोपकार के द्वारा तुम सर्वोच्च कल्याण प्राप्त करोगे ।”
  12. श्लोक 12[ श्रीकृष्ण ने आगे कहा - ] यज्ञ से प्रसन्न होकर देवता तुम्हें तुम्हारी इच्छित भोग वस्तुएँ प्रदान करेंगे । अतएव जो व्यक्ति देवताओं के द्वारा दिए गए उपहारों का उपभोग उनको अर्पण किये बिना करता है, वह अवश्य ही चोर है ।
  13. श्लोक 13जो पुण्यात्मा यज्ञ के अवशेष को ग्रहण करते हैं, वे अपने सभी दुष्कर्मों से मुक्त हो जाते हैं । परन्तु जो पापी केवल अपने ही सुख के लिए भोजन पकाते हैं, वे केवल बुरे कर्मफल के भागी होते हैं ।
  14. श्लोक 14सभी प्राणी अन्न पर निर्भर रहते हैं और अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है । वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ नियत कर्म से उत्पन्न होता है ।
  15. श्लोक 15यह जान लो कि नियत कर्म का उद्भव वेदों से होता है और वेद अविनाशी (परब्रह्म) से प्रकट होते हैं। अतएव सर्वव्यापक ब्रह्म (अर्थात परब्रह्म) यज्ञ में नित्य विद्यमान रहता है।
  16. श्लोक 16हे अर्जुन ! जो वर्णित तरीके से प्रवर्तित इस सृजनात्मक चक्र का अनुवर्तन नहीं करता है, वह पापमय जीवन जीता है और केवल इन्द्रियों में रमण करता है । ऐसे व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है ।
  17. श्लोक 17परन्तु जो व्यक्ति केवल आत्मा में ही रमण करता है, जो आत्मतृप्त है तथा आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके कोई कर्तव्य नहीं होते हैं ।
  18. श्लोक 18इस संसार में ऐसे आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति को न तो अपने निर्धारित कर्म के निर्वाह से कुछ लाभ प्राप्त करना है, न ही कर्मनिर्वाह न करने से उसे कुछ हानि होती है, और न ही वह किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी पर आश्रित होता है।
  19. श्लोक 19अतः सदैव फल की आसक्ति से रहित होकर अपने नियत कर्म को कुशलतापूर्वक करते रहो । आसक्ति रहित होकर अपने नियत कर्म को करने से मनुष्य निश्चित रूप से परम गति को प्राप्त करता है ।
  20. श्लोक 20निःसंदेह, केवल निष्काम कर्म से ही जनक* आदि ने सिद्धि प्राप्त की थी । जनसाधारण की शिक्षा के लिए आदर्श को ध्यान में रखते हुए भी तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन अवश्य करना चाहिए ।
  21. श्लोक 21श्रेष्ठ व्यक्ति जो भी कार्य करता है, सामान्य जन उसका अनुकरण करते हैं । ऐसा महान व्यक्ति जो भी आदर्श स्थापित करता है, सामान्य जन उसका अनुसरण करते हैं ।
  22. श्लोक 22हे अर्जुन ! मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं है क्योंकि तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मुझे प्राप्त न हुई हो और न ऐसी कोई वस्तु है जो भविष्य में प्राप्त करनी हो । फिर भी मैं क्रियाशील रहता हूँ ।
  23. श्लोक 23हे अर्जुन ! यदि मैं कभी भी सतर्कतापूर्वक क्रियाशील होना छोड़ दूँ, तो निश्चय ही सभी मनुष्य प्रत्येक विषय में मेरे पदचिन्हों का अनुसरण करेंगे ।
  24. श्लोक 24यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सभी लोक नष्ट हो जाएँगे और मैं समाज के वर्गों और उनके कर्तव्यों में व्यवधान का कारण बन जाऊँगा । इस प्रकार मैं इन लोगों के विनाश के लिए उत्तरदायी हो जाऊँगा ।
  25. श्लोक 25हे भारत ! जैसे अज्ञानी मनुष्य आसक्ति के साथ कर्म करते हैं, उसी प्रकार विद्वान मनुष्य को चाहिए कि वह संसार के कल्याण की इच्छा रखते हुए आसक्ति से रहित होकर कर्म करे ।
  26. श्लोक 26बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि वह कर्म में आसक्त अज्ञानी व्यक्तियों को (अकर्म की ओर प्रेरित करके) उनके मन को विचलित न करे । बल्कि समचित्त होकर सब प्रकार के कर्मों को सावधानी से करते हुए उन्हें कर्म में नियोजित करे ।
  27. श्लोक 27सभी क्रियाएँ प्रकृति के गुणों से बनी हुई इन्द्रियों द्वारा संचालित होते हैं । फिर भी, जिसका मन अहंकार से भ्रमित है, वह सोचता है, “मैं कर्ता हूँ ।“
  28. श्लोक 28परन्तु हे महाबाहो ! जो व्यक्ति आत्मा से मन और इन्द्रियों (गुणों) तथा उनके कार्यों (कर्म) के भेद के सत्य को जानता है, वह अनासक्त रहता है, क्योंकि वह यह जानता है कि केवल मन और इन्द्रियाँ (गुण) ही अपने-अपने विषयों (गुणेषु) में संलग्न हैं ।
  29. श्लोक 29प्रकृति के गुणों से मोहित होकर मनुष्य इन्द्रियों और उनके कार्यों में आसक्त हो जाते हैं । यथार्थ ज्ञान वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह उन लोगों के मन को विचलित न करे जो अज्ञानी हैं और जिनकी बुद्धि जागृत नहीं है ।
  30. श्लोक 30अतः तुम अपने समस्त कर्मों को मुझे अर्पण करके, अपने मन को आत्मा में स्थिर करके, फल की इच्छा से रहित होकर, स्वामित्व की समस्त धारणाओं से मुक्त होकर तथा समस्त मानसिक सन्तापों को त्यागकर युद्ध में लग जाओ ।
  31. श्लोक 31जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और ईर्ष्यारहित होकर मेरे इस उपदेश का निरन्तर पालन करते हैं, वे भी निश्चय ही कर्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं ।
  32. श्लोक 32परन्तु जो लोग ईर्ष्यालु हैं और मेरे इस उपदेश का पालन नहीं करते, उनके बारे में यह जान लो कि वे समस्त ज्ञान के विषय में मोहग्रस्त हैं, नष्ट होने को तत्पर है तथा विवेकबुद्धि से रहित हैं ।
  33. श्लोक 33ज्ञानी व्यक्ति भी अपने पूर्व-प्राप्त स्वभाव के अनुसार कार्य करता है । सभी जीव अपने प्राप्त स्वभाव का अनुसरण करते हैं । बाह्य संयम क्या कर लेगा?
  34. श्लोक 34इन्द्रियों का राग-द्वेष उनसे सम्बन्धित इन्द्रिय-विषयों में निहित होता है । मनुष्य को ऐसे राग-द्वेष के वश में नहीं आना चाहिए क्योंकि ये आध्यात्मिक साधक के मार्ग में बाधा है ।
  35. श्लोक 35स्वधर्म के पालन में भले ही किसी तरह का दुर्गुण हो, वह दूसरे के धर्म को अपनाने से श्रेष्ठ है, भले ही दूसरे के धर्म का पालन अच्छे से किया गया हो । यहाँ तक कि स्वधर्म का निर्वाह करते हुए मृत्यु भी हो जाए तो वह दूसरे के धर्म के पालन से श्रेष्ठ है, क्योंकि दूसरे के धर्म का पालन भयानक है ।
  36. श्लोक 36अर्जुन ने पूछा: हे कृष्ण ! मनुष्य को अनिच्छा से भी पाप करने के लिए क्या प्रेरित करता है, मानो उसे बलपूर्वक नियोजित किया जा रहा हो ?
  37. श्लोक 37श्रीभगवान् ने उत्तर दिया - यह भौतिक इच्छा (काम) है, जो रजोगुण से उत्पन्न होती है और बाद में क्रोध में बदल जाती है । वह तृप्त नहीं होती और अत्यन्त अशुभ है । इसे मोक्षमार्ग का शत्रु जानो ।
  38. श्लोक 38जिस प्रकार अग्नि धुएँ से, दर्पण धूल से तथा भ्रूण गर्भ से ढका रहता है, उसी प्रकार ज्ञान भी काम से ढका रहता है ।
  39. श्लोक 39हे अर्जुन ! यह काम ज्ञानियों का नित्य शत्रु है । यह अग्नि के समान कभी न बुझने वाला है एवं विवेक को ढक लेता है।
  40. श्लोक 40इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि को काम का निवासस्थान कहा गया है । इनके माध्यम से विवेक को ढककर काम देहधारी आत्मा को भ्रमित कर देता है।
  41. श्लोक 41अतः हे भरतश्रेष्ठ ! पहले अपनी इन्द्रियों को नियमित करके इस पापरूपी काम को त्याग दो । यह विवेक और (सत्य के) साक्षात्कार को नष्ट कर देता है ।
  42. श्लोक 42इन्द्रियों को [ स्थूल शरीर आदि प्रत्यक्ष अनुभूति के विषयों से ] परे कहा गया है । इन्द्रियों से परे मन है । मन से भी परे बुद्धि है । परन्तु बुद्धि से भी परे तो वह [आत्मा] है ।
  43. श्लोक 43हे महाबाहु अर्जुन ! इस प्रकार आत्मा को बुद्धि से परे जानकर तथा निश्चयात्मक बुद्धि द्वारा मन को स्थिर करके, इस दुर्जेय कामरूपी शत्रु का नाश करो ।