भ. गी. 3.2
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥
अनुवाद
आप अपने विरोधाभासी शब्दों से मेरी बुद्धि को भ्रमित जैसा कर रहे हैं । कृपया निश्चय करके मुझे वह एक विधि बताइए जिससे मैं सर्वोच्च कल्याण प्राप्त कर सकूँ ।
आप अपने विरोधाभासी शब्दों से मेरी बुद्धि को भ्रमित जैसा कर रहे हैं । कृपया निश्चय करके मुझे वह एक विधि बताइए जिससे मैं सर्वोच्च कल्याण प्राप्त कर सकूँ ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि अर्जुन के मन में अपने परिजनों के प्रति आसक्ति थी और वह युद्ध नहीं करना चाहता था। जब भगवान ने सकाम कर्म की अपेक्षा बुद्धि/ज्ञान को श्रेष्ठ बताया, तो अर्जुन ने अपनी वासना के अनुसार उसका यह अर्थ निकाला कि कर्म करना ही नहीं चाहिए। इसलिए वह भगवान से पूछता है कि यदि बुद्धि/ज्ञान ही श्रेष्ठ है तो आप मुझे युद्ध रूपी घोर कर्म में क्यों नियोजित कर रहे हैं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कभी भी युद्ध छोड़ने या जंगल जाने का आदेश नहीं दिया; बल्कि भगवान तो उसे बार-बार "तस्माद्युध्यस्व भारत" कहकर युद्ध के लिए ही प्रेरित कर रहे थे।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन भगवान पर धोखा देने का कोई आक्षेप या चेतावनी नहीं दे रहा था, और न ही 'व्यामिश्र' का अर्थ दूध-पानी अलग करना था।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि भगवान किसी को भ्रम में नहीं डालते। अर्जुन अपनी समझ की कमी स्वीकार करते हुए बहुत सावधानी से दो बार 'इव' ('जैसे कि आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं') शब्द का प्रयोग करता है ताकि भगवान पर आक्षेप न लगे। 'व्यामिश्र' की तुलना 'खिचड़ी' से की गई है जहाँ दाल और चावल मिलकर एक हो जाते हैं और अलग स्वाद का पता नहीं चलता। इसलिए अर्जुन प्रार्थना करता है कि उसे संशय से निकालकर एक निश्चित 'श्रेयस' मार्ग बताया जाए।
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