भ. गी. 3.41
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
अनुवाद
अतः हे भरतश्रेष्ठ ! पहले अपनी इन्द्रियों को नियमित करके इस पापरूपी काम को त्याग दो । यह विवेक और (सत्य के) साक्षात्कार को नष्ट कर देता है ।
अतः हे भरतश्रेष्ठ ! पहले अपनी इन्द्रियों को नियमित करके इस पापरूपी काम को त्याग दो । यह विवेक और (सत्य के) साक्षात्कार को नष्ट कर देता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार मन और बुद्धि अत्यधिक शक्तिशाली हैं, इसलिए आरंभ में इंद्रियों को रोकना मन की तुलना में अधिक सुलभ और व्यावहारिक होता है। 'भरतर्षभ' सम्बोधन अर्जुन को हतोत्साहित बताने के लिए नहीं बल्कि उनमें संयम की श्रेष्ठ योग्यता दर्शाने के लिए है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि मन में अनेक कामनाएँ आती हैं जिन्हें तुरंत रोकना कठिन है, परंतु अपनी इंद्रियों (हाथ, पैर, वाणी आदि) को क्रियान्वित होने से रोकना मनुष्य के हाथ में होता है। इसलिए भगवान पहले इंद्रिय-संयम का निर्देश देते हैं। इसके साथ ही, भरत महाराज के चक्रवर्ती राज्य के त्याग का उदाहरण देते हुए अर्जुन को 'भरतर्षभ' (भरतवंशियों में श्रेष्ठ) कहकर उनके भीतर छिपे त्याग और संयम के गुण को जाग्रत किया गया है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि जिह्हा देखने या सुनने का कार्य नहीं करती, और न ही काम आत्मा का स्थायी विनाश कर सकता है, क्योंकि आत्मा नित्य व प्रकाशस्वरूप है और काम केवल उसके विवेक को ढक लेता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता श्रीमद्भागवत के उद्धव उपदेश का उद्धरण देकर बताते हैं कि जिह्हा दोहरे कार्य (आहार ग्रहण और वाणी) के कारण सबसे शक्तिशाली इंद्रिय है। यदि जिह्हा पर नियंत्रण हो जाए, तो अन्य सभी इंद्रियों पर नियंत्रण सहज हो जाता है। इसके अतिरिक्त, 'नाशनम्' का अर्थ आत्मा या ज्ञान का सर्वथा विनाश होना नहीं है, बल्कि काम द्वारा विवेक और तत्व-साक्षात्कार के ज्ञान का बाहर से ढका जाना है।
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