भ. गी. 3.41

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥

अनुवाद

अतः हे भरतश्रेष्ठ ! पहले अपनी इन्द्रियों को नियमित करके इस पापरूपी काम को त्याग दो । यह विवेक और (सत्य के) साक्षात्कार को नष्ट कर देता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा 'तस्मात् त्वम् इन्द्रियाणि आदौ नियम्य' कहकर सबसे पहले इंद्रियों को ही वश में करने का निर्देश क्यों दिया गया है, तथा अर्जुन के लिए 'भरतर्षभ' सम्बोधन का क्या अभिप्राय समझाया गया है?

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