भगवद्गीता के श्लोक ४.३५ ("यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्...") की व्याख्या के अनुसार, आत्मज्ञान प्राप्त होने पर पुनः 'मोह' न होने का क्या कारण समझाया गया है, तथा अर्जुन का मोह किस भ्रम-ज्ञान पर आधारित था?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि यह ज्ञान केवल शब्दों का नहीं बल्कि अनुभवात्मक (अनुभव पर आधारित) है, जिसे एक बार सीख लेने पर साधक कभी नहीं भूलता। इसके अलावा, अर्जुन का मोह इसी विपर्यय (भ्रम-ज्ञान) से उत्पन्न हुआ था जहाँ वे शरीर को आत्मा और अपने शत्रुओं को केवल शारीरिक संबंध से 'स्वजन' मान रहे थे।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान के अनुसार आत्मज्ञान को बार-बार रटने की आवश्यकता नहीं होती और न ही अर्जुन का मोह अस्त्र-शस्त्र की कमी के कारण था।
भगवद्गीता के श्लोक ४.३६ में 'अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः...' कहते हुए भगवान द्वारा 'अपि चेत्' शब्द के प्रयोग का क्या विशेष शास्त्रीय अभिप्राय समझाया गया है, तथा 'ज्ञान-प्लव' (ज्ञान रूपी नौका) द्वारा पाप-सागर को पार करने का क्या रहस्य बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'अपि चेत्' का प्रयोग वहाँ होता है जहाँ प्रायः संभावना नहीं होती, केवल एक कल्पना के रूप में मान लिया जाता है। इसके साथ ही, जैसे १०० वर्ष पुराने अंधेरे कमरे में दीपक आते ही अंधकार नष्ट होने में १०० वर्ष नहीं लगते, उसी प्रकार ज्ञान रूपी नौका से पाप रूपी समुद्र तुरंत पार हो जाता है और सारे पाप एक क्षण में नष्ट हो जाते हैं।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि ज्ञान रूपी नौका से समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं, न कि नरक में करोड़ों वर्ष रहना पड़ता है।