भ. गी. 4.36

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥

अनुवाद

यदि तुम सबसे निकृष्ट पापी भी हो तो भी तुम ज्ञान रूपी नौका से समस्त पापों के सागर को पार कर जाओगे ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.३५ ("यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्...") की व्याख्या के अनुसार, आत्मज्ञान प्राप्त होने पर पुनः 'मोह' न होने का क्या कारण समझाया गया है, तथा अर्जुन का मोह किस भ्रम-ज्ञान पर आधारित था?

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