ज्ञानयोग
अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था क्योंकि वह सोचता था कि परिजनों की हत्या करने से उसे पाप लगेगा, जबकि उसकी वास्तविक रुचि मोक्षप्राप्ति में थी । अर्जुन ने श्रीकृष्ण भगवान के पूर्व निर्देशों का अर्थ समझा कि कर्मत्याग कर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । फलतः अध्याय ३ के आरम्भ में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा, "आप मुझे इस घोर युद्ध में क्यों लगाना चाहते हैं?" उत्तर में श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म करने पर जोर दिया । उसी अध्याय के अन्त में अर्जुन ने पूछा कि एक व्यक्ति को पाप करने के लिए क्या प्रेरित करता है । श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि सांसारिक कामना व्यक्ति को दुष्कर्म करने के लिए प्रेरित करती है । विषय को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण चौथे अध्याय में निष्काम कर्मयोग के विषय में कहते हैं, जो व्यक्ति को सांसारिक बन्धन से मुक्त करता है । ऐसा प्रतीत होता है कि अर्जुन के प्रश्न ने श्रीकृष्ण के उपदेश की धारा मे अवरोध पैदा किया इसलिए तीसरे अध्याय में उन्होंने कर्मयोग की अपनी व्याख्या पूरी नहीं की थी । इस अध्याय के प्रथम श्लोक से यह ज्ञात होता है कि पिछले अध्याय में जिस योग के विषय में श्रीकृष्ण ने उल्लेख किया था उसका ही वर्णन यहाँ दिया गया है । प्रथम श्लोक में लिखित सर्वनाम "इमं" (इस) शब्द के प्रयोग से यह ज्ञात होता है ।
चौथे अध्याय में बयालीस श्लोक हैं; एक श्लोक अर्जुन के द्वारा और शेष श्रीकृष्ण के द्वारा कहे गए हैं । जबकि तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग के विषय में कहते हैं, चौथे अध्याय में वे उसी कर्मयोग का विस्तृत वर्णन करते हैं । इस अध्याय के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण यह दर्शाते हैं कि निष्काम कर्म योग का ज्ञान अनादि होते हुए भी योग्य शिक्षकों की अनुपलब्धि होने के कारण जगत से लुप्त हो गया था । श्रीकृष्ण वर्णन करते हैं कि यह शिक्षा प्राचीन परम्परा से कैसे दी जाती थी (१-३) ।
श्रीकृष्ण अपने विषय में बताते हैं और यह भी बताते हैं, कि वे कैसे कर्म (फल) से बन्धे नहीं हैं (५-१५) । वे घोषणा करते हैं कि, "अब मैं तुम्हें कर्म का रहस्य समझाऊँगा, जिसे जानकर तुम कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाओगे" अर्थात् तुम्हें जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त होगी (१६) । वे कहते हैं कि विवेक से कर्म को कैसे अकर्म में परिणत करना है अर्थात् कर्मफल में अनासक्त भाव से भगवान को अर्पित करना है (१७-३२) । अर्जुन यह समझ जाता है कि निष्काम कर्म योग कैसे ज्ञान योग की ओर ले जाता है, जैसा कि श्रीकृष्ण घोषित करते हैं "हे पार्थ ! द्रव्य की आहुति से ज्ञान-वृद्धि के प्रयत्न (यज्ञ) श्रेष्ठ हैं क्योंकि सभी (यज्ञरूपी) कर्म सर्वरूप से ज्ञान में परिणत होते हैं"(३३) ।
श्रीकृष्ण तब तत्त्वदर्शी गुरु से तत्त्वज्ञान प्राप्त करने के महत्त्व का वर्णन करते हैं । वे अर्जुन को ऐसे गुरु से ज्ञान ग्रहण करने के लिए निर्देश देते हैं कि "तद्विद्धि अर्थात् तुम इस ज्ञान को आत्मसात करो" (३४) । श्रीकृष्ण इस विषय का सारांश देते हुए कहते हैं, "इस जगत में निश्चित रूप से ज्ञान के समान शुद्ध करने वाला और कुछ भी नहीं है । निष्काम कर्मयोग से सिद्ध पुरुष को समय आने पर आत्मसाक्षात्कार हो जाता है” (३८) । वे पुनः अर्जुन से अपने कर्त्तव्य को पूरा करने का अनुरोध करते हैं अर्थात् युद्ध करने को कहते हैं । (४२) । इस प्रकार कर्म योग द्वारा तत्त्वज्ञान की प्राप्ति से आत्मसाक्षात्कार की साधन प्रक्रिया की यहाँ संस्तुति की गई है।
सभी श्लोक
- श्लोक 1श्रीभगवान् ने कहा - मैंने सूर्य देव विवस्वान को यह अविनाशी योग सिखाया था । फिर विवस्वान ने इसे मनु को बताया और मनु ने इसे राजा इक्ष्वाकु को सुनाया।
- श्लोक 2राजर्षियों ने इस ज्ञानयोग को परम्परा से प्राप्त करके इसी प्रकार समझा । हे शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले ! समय के दीर्घ अन्तराल में यह योग संसार से धीरे धीरे लुप्त हो गया।
- श्लोक 3आज मैंने वही अति प्राचीन योग तुमसे कहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त एवं मित्र हो । निःसंदेह यह परम रहस्य है।
- श्लोक 4अर्जुन ने पूछा - आपका जन्म तो अल्पकाल पूर्व ही हुआ है, जबकि विवस्वान का जन्म तो दीर्घकाल पहले हुआ था । मैं कैसे समझूँ कि आपने प्राचीनकाल में उन्हें यह योग सिखाया था ?
- श्लोक 5श्रीभगवान् ने उत्तर दिया - हे अर्जुन, तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं । मुझे वे सब ज्ञात हैं परन्तु हे शत्रुओं को दग्ध करने वाले, तुम उन्हें नहीं जानते ।
- श्लोक 6यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, मेरा दिव्य शरीर अव्यय है, और यद्यपि मैं सभी प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी ही प्रकृति (स्वरूप) में स्थित होकर, मैं अपनी आत्ममाया से (इस संसार में) प्रकट होता हूँ ।
- श्लोक 7हे भारत, जब-जब भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ ।
- श्लोक 8मैं प्रत्येक युग** में साधुओं की रक्षा और दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए तथा धर्म की स्थापना हेतु प्रकट होता हूँ ।
- श्लोक 9अर्जुन, जो मेरे जन्म और कर्मों की दिव्यता को इस प्रकार यथार्थ रूप से जान लेता है वह शरीर त्यागने के पश्चात् पुनर्जन्म नहीं लेता अपितु मुझे प्राप्त करता है ।
- श्लोक 10आसक्ति, भय और क्रोध से पूर्णतया मुक्त होकर, मुझमें पूर्णतया तल्लीन होकर, मेरी शरण लेकर तथा ज्ञान और तप से शुद्ध होकर अनेक मनुष्यों ने पूर्वकाल में मुझे प्राप्त किया है ।
- श्लोक 11हे पृथापुत्र, जो मेरी शरण में आते हैं, मैं उनके साथ उनकी शरणागति के अनुरूप ही व्यवहार करता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य [चाहे उनका स्वभाव जो भी हो] हर प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं ।
- श्लोक 12अपने कर्मों के फल चाहने वाले मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि इस मनुष्यलोक में कर्म से उत्पन्न होने वाली सफलता शीघ्र मिलती है ।
- श्लोक 13मैंने विभिन्न मनुष्यों में सक्रिय गुणों की प्रधानता और उनके कर्मों के स्वरूप के अनुसार यह चार वर्णों* वाली व्यवस्था मनुष्य समाज के लिए रची थी । यद्यपि मैं इस प्रणाली का प्रवर्तक हूँ फिर भी तुम मुझ अविनाशी को (गुणों से परे और अपरिवर्तनीय) अकर्ता जानो ।
- श्लोक 14कर्म मुझे बाँधते नहीं हैं क्योंकि मुझमें कर्मफल की इच्छा नहीं है । जो मुझे इस प्रकार जानता है वह कर्मों से बँधता नहीं है ।
- श्लोक 15ऐसा जानकर प्राचीनकाल के मोक्षकामी भी कर्म में भाग लेते थे । अतः तुम भी पूर्वकाल में पूर्वजों द्वारा किये गये कर्मों को करो ।
- श्लोक 16कर्म क्या है और अकर्म क्या है ? इस विषय में तो ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं । अब मैं तुम्हें कर्म का सत्य समझाऊँगा जिसे जानकर तुम कर्म के बन्धन से मुक्त हो जाओगे ।
- श्लोक 17मनुष्य को निर्धारित कर्म, निषिद्ध कर्म और अकर्म के सत्य का बोध होना चाहिए क्योंकि कर्म की आन्तरिक प्रक्रिया को समझ पाना कठिन है ।
- श्लोक 18जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है वही मनुष्यों में बुद्धिमान है । ऐसा मनुष्य समचित्त होकर सभी कर्मों में भाग लेता है ।
- श्लोक 19जो प्रत्येक कार्य को भोग की इच्छा से रहित होकर करता है और जिसके कर्म ज्ञानाग्नि द्वारा भस्म हो चुके हैं उसे विवेकीजन पण्डित कहते हैं ।
- श्लोक 20जिसने कर्म और उसके फलों के प्रति समस्त आसक्ति को त्याग दिया है, जो सदैव सन्तुष्ट रहता है और किसी पर आश्रित नहीं होता – ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से कर्म में प्रवृत्त होकर भी कुछ नहीं करता है ।
- श्लोक 21जिसमें (भोग की) लालसा नहीं है, जिसका मन और शरीर नियन्त्रित है और जिसने (सभी वस्तुओं पर) हर प्रकार का स्वामित्व भाव त्याग दिया है – ऐसा व्यक्ति केवल शरीर के निर्वाह हेतु कर्म करते हुए भी पाप में लिप्त नहीं होता है।
- श्लोक 22ईश्वर की इच्छा से जो कुछ भी प्राप्त होता है उसी में सन्तुष्ट रहते हुए जिसने सभी द्वन्द्वों को पार कर लिया है, जो ईर्ष्या से मुक्त है और सफलता तथा असफलता में समचित्त रहता है – वह कर्म करते हुए भी बँधता नहीं है।
- श्लोक 23जो आसक्ति एवं देहात्म भाव से मुक्त है, जिसका मन आत्मज्ञान में स्थित है और जो केवल यज्ञ (अर्थात् अन्तर्यामी परमेश्वर की उपासना) के लिए कार्य करता है, उसके सारे कर्म विलीन हो जाते हैं ।
- श्लोक 24जिनसे अर्पण किया जाये वे स्रुक् स्रुवा आदि पात्र ब्रह्म हैं, हव्य पदार्थ ब्रह्म है, यज्ञ की जिस अग्नि में आहुति दी जाती है वह ब्रह्म है, जिस पुरोहित द्वारा आहुति दी जाती है वह ब्रह्म है, तथा आहुति देने की क्रिया भी ब्रह्म है । जिसका चित्त ब्रह्मस्वरूप यज्ञ कर्म में तल्लीन है उसका गन्तव्य केवल ब्रह्म ही है ।
- श्लोक 25कुछ अन्य जो कर्मयोगी हैं वे केवल देवताओं के लिए किए जाने वाले यज्ञों के द्वारा उनकी पूर्णतया उपासना करते हैं । कुछ अन्य जो (ज्ञानयोगी) हैं वे केवल प्रणव* (यज्ञ) के उच्चारण द्वारा ही ब्रह्म की अग्नि में स्वयं (यज्ञ) की आहुति देते हैं ।
- श्लोक 26कुछ अन्य साधक आत्मसंयम की अग्नि में श्रवणेन्द्रिय आदि इन्द्रियों की आहुति देते हैं जबकि कुछ अन्य साधक इन्द्रियों की अग्नि में शब्द आदि विषयों की आहुति देते हैं ।
- श्लोक 27कुछ अन्य साधक इन्द्रियों की एवं प्राणवायुओं की समस्त क्रियाओं को ज्ञान द्वारा प्रज्वलित आत्मसंयम रूपी योग की अग्नि में अर्पित करते हैं ।
- श्लोक 28कुछ लोग द्रव्य दान देकर यज्ञ करते हैं, कुछ तपस्या द्वारा यज्ञ करते हैं, कुछ योग साधना के अनुशासन से यज्ञ करते हैं, और कुछ वेदों के स्वाध्याय द्वारा ज्ञान की साधना करते हुए यज्ञ करते हैं । अपनी-अपनी साधना में दृढ़ रहते हुए ये सभी साधक कठोर व्रतों का पालन करते हैं ।
- श्लोक 29जो अन्य साधक प्राणायाम* में रत हैं, वे उर्ध्वगामी और अधोगामी प्राणवायुओं की गति को नियन्त्रित करते हुए उर्ध्वगामी वायु को अधोगामी में तथा अधोगामी वायु को उर्ध्वगामी में अर्पित करते हैं ।
- श्लोक 30-31aअन्य साधक अपने आहार को नियमित रखते हुए इन्द्रियों की क्रियाओं को (उन्हें सम्भव बनाने वाली) प्राणवायुओं में अर्पित करते हैं । निःसंदेह ये सभी यज्ञ के ज्ञाता, जो यज्ञ के द्वारा अपने पापों से शुद्ध हो जाते हैं और यज्ञ के अमृतमय अवशेष का पान करते हैं, वे शाश्वत ब्रह्म – परम सत्य – को प्राप्त करते हैं ।
- श्लोक 31bकुरुश्रेष्ठ, जो यज्ञ नहीं करता है वह तो इस तुच्छ सुखों वाले मनुष्यलोक को भी प्राप्त नहीं कर सकता है फिर स्वर्गीय सुख वाले अन्य लोक की तो बात ही क्या है ।
- श्लोक 32इस तरह वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञ प्रतिपादित किए गए हैं । इन सभी को वाणी, मन और शरीर के कर्मों से उत्पन्न जानो । इस सत्य को जानकर तुम कर्मबन्धन से मुक्त हो जाओगे ।
- श्लोक 33हे शत्रुओं को दग्ध करने वाले, बाह्य पदार्थों से सम्बन्धित यज्ञ की अपेक्षा जागरुकता द्वारा किया गया यज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि हे पार्थ, सभी कर्म अन्ततः जागरुकता में ही समाप्त होते हैं ।
- श्लोक 34तुम्हें आत्मसमर्पण, गहन प्रश्न और निःस्वार्थ सेवा के द्वारा इस ज्ञान को आत्मसात करना है । प्रबुद्ध जागरुकता में स्थित तत्त्वदर्शी तुम्हें इस ज्ञान में निर्देश देंगे ।
- श्लोक 35अर्जुन, इस ज्ञान को आत्मसात कर लेने के पश्चात् तुम पुनः कभी ऐसे मोह में नहीं फँसोगे । इस ज्ञान के द्वारा तुम प्रत्यक्ष रूप से समस्त जीवित प्राणियों को पहले जीवात्मा में और फिर मुझमें स्थित देखोगे ।
- श्लोक 36यदि तुम सबसे निकृष्ट पापी भी हो तो भी तुम ज्ञान रूपी नौका से समस्त पापों के सागर को पार कर जाओगे ।
- श्लोक 37हे अर्जुन, जैसे धधकती अग्नि लकड़ी को राख बना देती है उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर देती है ।
- श्लोक 38इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली अन्य कोई वस्तु नहीं है । जिसने निष्काम कर्मयोग से पूर्ण सिद्धि प्राप्त की है उसे समय आने पर स्वतः ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है ।
- श्लोक 39जो श्रद्धालु* है, जो इस निष्काम कर्मयोग की साधना में एकनिष्ठ है, और जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया संयमित हैं – वह ज्ञान प्राप्त करता है और इस ज्ञान के साक्षात्कार होने पर वह तत्काल परम शान्ति प्राप्त करता है ।
- श्लोक 40जो अज्ञानी है, श्रद्धाहीन है, और जिसका हृदय सन्देह से जकड़ा हुआ है वह नष्ट हो जाता है । सन्देहग्रस्त व्यक्ति के लिए न तो यह लोक है, न इसके परे स्वर्गलोक है और न ही सुख है ।
- श्लोक 41अर्जुन, जिसने निष्काम कर्मयोग के द्वारा अपने सारे सकाम कर्म त्याग दिए हैं, जिसके सभी संशय ज्ञान के द्वारा कट गए हैं तथा जो आत्मसाक्षात्कारी हैं, उसे कर्म बाँध नहीं सकते हैं ।
- श्लोक 42अतएव हे अर्जुन, अपने हृदय में स्थित इस आत्मा के अज्ञान से उत्पन्न संशय को ज्ञान की तलवार से काट डालो तथा निष्काम कर्मयोग में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ ।
प्रश्न