भ. गी. 5.20

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥

अनुवाद

जो ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म में स्थित है, जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोहित नहीं है, वह न तो प्रिय को पाकर प्रसन्न होता है, और न अप्रिय को पाकर व्याकुल होता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.१९ ("इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः...") की व्याख्या के अनुसार, 'प्रपंच' और 'संसार' के बीच क्या सूक्ष्म तात्विक अंतर बतलाया गया है, तथा जिसका मन समता में स्थित है वह इसी जीवन में ('इहैव') भव-बंधन पर कैसे विजय प्राप्त कर लेता है?

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