भ. गी. 5.20
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥
अनुवाद
जो ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म में स्थित है, जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोहित नहीं है, वह न तो प्रिय को पाकर प्रसन्न होता है, और न अप्रिय को पाकर व्याकुल होता है ।
जो ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म में स्थित है, जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोहित नहीं है, वह न तो प्रिय को पाकर प्रसन्न होता है, और न अप्रिय को पाकर व्याकुल होता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि प्रपंच को सत्य बतलाया गया है, और सुशुप्ति या मूर्छा में अज्ञान (मोह) बना रहता है, वह वास्तविक समता या ज्ञान-निष्ठा नहीं है।
विकल्प ख (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि ५ महाभूतों से बनी प्रकृति (प्रपंच) मिथ्या नहीं बल्कि सत्य है, परंतु उसमें अपना राग-द्वेष जोड़कर देखना ही 'संसार' और बंधन है। जब साधक का मन राग-द्वेष से मुक्त होकर समता में टिक जाता है, तो वह इसी जीवन में ('इहैव') द्वैत-प्रपंच को जीत लेता है। क्योंकि ब्रह्म/आत्मा निर्दोष और सम है, इसलिए स्वरूप में स्थित होते ही जीव ब्रह्म में स्थित हो जाता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता श्रीरामानुजाचार्य जी के मत से समझाते हैं कि 'स्थिरबुद्धि' वह है जिसकी बुद्धि नित्य आत्मा/परमात्मा में टिकी हो। छोटा बालक या गहरी नींद में सोया व्यक्ति भी तात्कालिक रूप से शांत दिखता है, परंतु उनके भीतर अज्ञान व संस्कार निष्क्रिय (deactivated) रहते हैं। इसके विपरीत, ज्ञानी पुरुष 'असंमूढ' (मोह-रहित व आत्म-ज्ञानी) होकर नित्य शांति में स्थित रहता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि ज्ञानी पुरुष जान-बूझकर दुखों को नहीं माँगता और न ही उसकी इंद्रियाँ नष्ट होती हैं; वह केवल साक्षी भाव से रहते हुए अनुकूल-प्रतिकूल में विकृत नहीं होता
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