कर्म-सन्न्यासयोग
इस अध्याय में उनतीस श्लोक हैं । प्रथम श्लोक अर्जुन का प्रश्न है और शेष श्लोक श्रीकृष्ण के उत्तर हैं । ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों की महिमा के साथ-साथ, बुद्धि को विकसित करने और अपने कर्त्तव्य का पालन करने की श्रीकृष्ण के द्वारा प्रदत्त शिक्षा को सुनकर, अर्जुन यह निर्णय नहीं कर सका कि दोनों में से किस विद्या का पालन किया जाए ।
गत अध्याय के श्लोक ४०, में श्रीकृष्ण ने विशेष रूप से संशयग्रस्त साधक की दयनीय दुर्दशा का वर्णन किया है । इस प्रकार अपने सन्देह को दूर करने के लिए अर्जुन इस अध्याय में श्रीकृष्ण से पूछता है कि ज्ञानमार्ग या निष्काम कर्ममार्ग दोनों में से कौन सा अधिक श्रेयस्कर है । श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं, कि "कर्मसन्न्यास और निष्काम कर्मयोग दोनों ही परम कल्याण की ओर ले जाते हैं, लेकिन दोनों में से निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठतर है" (२) ।
श्रीकृष्ण इस विषय का (३-२६) और ध्यानयोग का (२७-२८) विस्तार से वर्णन करते हैं: "जो साधक बाह्य विषयों से इन्द्रियों को हटाकर सभी (उद्भूत) विचारों को रोकता है, जो भौंहों के मध्य ध्यान केन्द्रित करके प्राणायाम से सांसों को नियन्त्रित करता है, जिस साधक ने सभी इन्द्रिय, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो कामना, भय और क्रोध से मुक्त है और मोक्षप्राप्ति के लिए एकनिष्ठ है, वह वास्तव में मुक्त है । यह ध्यान-प्रक्रिया ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग दोनों में सहायक होती है और परम आनन्द की ओर भी ले जाती है" । श्रीकृष्ण ने इस घोषणा से अध्याय का समापन किया कि "मुझे सभी यज्ञ और तपस्याओं के भोक्ता, लोकमहेश्वर और सभी जीवों के शुभ चिन्तक के रूप में जानकर साधक शान्ति को प्राप्त करते हैं" (२९) ।
सभी श्लोक
- श्लोक 1अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण, मुझे कर्म-संन्यास का उपदेश देने के पश्चात् आप पुनः निष्काम कर्मयोग का भी उपदेश दे रहे हैं । कृपया मुझे निश्चयपूर्वक बताएँ कि इन दोनों में से कौन सा सबसे अधिक कल्याणकारी है ।
- श्लोक 2श्रीभगवान् ने कहा - कर्म-सन्न्यास एवं निष्काम कर्मयोग दोनों ही परम कल्याणकारी हैं परन्तु कर्म-सन्न्यास की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है ।
- श्लोक 3हे महाबाहो, जो कर्मयोगी न तो कभी किसी से द्वेष करता है और न ही किसी की आकांक्षा रखता है, उसे (कर्म में रत रहते हुए भी) प्रत्येक क्षण सन्न्यासी समझना चाहिए क्योंकि जो द्वन्द्वों से रहित है, वह सहज ही बन्धन से मुक्त हो जाता है ।
- श्लोक 4अनुभवहीन व्यक्ति कहते हैं कि कर्म-सन्न्यास (सांख्ययोग) एवं निष्काम कर्मयोग पृथक् मार्ग हैं परन्तु विवेकी जन इस निष्कर्ष का समर्थन नहीं करते क्योंकि जो व्यक्ति दोनों में से किसी एक में भी दृढ़ता से स्थित होता है, उसे दोनों का फल प्राप्त हो जाता है ।
- श्लोक 5जो स्थिति सन्न्यास (सांख्ययोग) से प्राप्त होती है, वही निष्काम कर्मयोग से भी प्राप्त होती है । जो सन्न्यास एवं निष्काम कर्म, दोनों मार्गों को एक ही समझता है, उसकी दृष्टि यथार्थ है ।
- श्लोक 6हे महाबाहो, निष्काम कर्मयोग के बिना कर्म से सन्न्यास प्राप्त करना कठिन है । परन्तु जो मुनि निष्काम कर्म में रत रहता है, वह शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ।
- श्लोक 7जो निष्काम कर्मयोग का पालन करता है, जिसका चित्त शुद्ध है, जिसने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, और जो समस्त जीवों के लिए उनकी आत्मा के समान प्रिय है, वह कर्म करते हुए भी कभी लिप्त नहीं होता ।
- श्लोक 8-9जो निष्काम कर्म से युक्त है और जिसने प्रत्यक्ष रूप से तत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है, वह निश्चित रूप से जान लेता है कि देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, खाते, चलते, सोते, साँस लेते, बोलते, मलमूत्र त्याग करते, ग्रहण करते तथा नेत्रों की पलकें खोलते-बन्द करते समय भी केवल इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में संलग्न रहती हैं । अत: वह यह मानता है - “मैं तो कुछ भी नहीं करता ।”
- श्लोक 10जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी गीला नहीं होता, वैसे ही परमेश्वर को अपने कर्म समर्पित करने वाला तथा कर्म और उसके फल के प्रति समस्त आसक्ति का त्याग करने वाला व्यक्ति, कर्म में भाग लेकर भी पाप में लिप्त नहीं होता।
- श्लोक 11कर्मयोगी आसक्ति का त्याग करके शरीर, मन, बुद्धि और यहाँ तक कि केवल इन्द्रियों के द्वारा भी अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं ।
- श्लोक 12कर्मफल का त्याग करके निष्काम कर्म से युक्त व्यक्ति शाश्वत शान्ति प्राप्त करता है । परन्तु स्वार्थ से कर्म करने वाला व्यक्ति, कामना से प्रेरित होने के कारण फल में आसक्त होकर बन्धन में ही पड़ा रहता है ।
- श्लोक 13मन से सभी कर्मों का त्याग करके, शरीर एवं मन को वश में करके, वह देहधारी आत्मा नौ द्वारों वाले नगर* में सुखपूर्वक निवास करता है । वह न तो कर्म करता है और न ही कर्म करवाता है ।
- श्लोक 14ईश्वर जीव की कर्तृत्व-भावना, कर्म एवं उसके फल के संयोग को उत्पन्न नहीं करते हैं । अपितु जीव का स्वभाव ही इसमें कार्य करता है* ।
- श्लोक 15सर्वव्यापी ईश्वर किसी के पाप या पुण्य में लिप्त नहीं होते । परन्तु जीव मोहग्रस्त रहते हैं क्योंकि उनका आत्मज्ञान अविद्या (माया शक्ति) से आवृत रहता है।
- श्लोक 16परन्तु जिनकी अविद्या विद्या के कारण नष्ट हो गयी है, उनकी विद्या अप्राकृत आत्मज्ञान को ठीक उसी प्रकार प्रकाशित करती है, जैसे सूर्य संसार को प्रकाशित करता है।
- श्लोक 17जिनकी बुद्धि उन (परमेश्वर) में स्थिर है, जिनका मन उनके ध्यान में लीन है, जिन्की उनमें निष्ठा है, जो उनके परायण हैं, तथा जिनके पाप (परमेश्वर के) साक्षात्कार से नष्ट हो गए हैं, वे उस गन्तव्य को प्राप्त करते हैं जहाँ से कोई लौटता नहीं ।
- श्लोक 18जो विवेकी है, वे विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान दृष्टि से देखते हैं।
- श्लोक 19जिनका मन समत्व में स्थित है, वे इस संसार में रहते हुए भी भवबन्धन को पार कर लेते हैं, क्योंकि ब्रह्म निर्दोष है और ब्रह्म ही समत्व है। अतः समदृष्टि से युक्त व्यक्ति (अद्वय परम सत्य) ब्रह्म में स्थित होते हैं।
- श्लोक 20जो ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म में स्थित है, जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोहित नहीं है, वह न तो प्रिय को पाकर प्रसन्न होता है, और न अप्रिय को पाकर व्याकुल होता है ।
- श्लोक 21जिसका मन बाह्य इन्द्रियविषयों से अनासक्त हो जाता है, वह अन्तःकरण में निहित सुख को प्राप्त करता है । ऐसा व्यक्ति, जो भक्तिभाव द्वारा ईश्वर से युक्त हो गया है, अक्षय सुख का आस्वादन करता है ।
- श्लोक 22हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों के स्पर्श से उत्पन्न समस्त भोग दुःख के ही स्रोत हैं । इनका आदि और अन्त होता है । अतः विवेकशील मनुष्य इनमें रमण नहीं करते ।
- श्लोक 23जो मनुष्य इसी जीवन में शरीर त्यागने से पूर्व काम और क्रोध से उत्पन्न वेगों को सहन कर पाता है, उसका मन समता में स्थित है और वह सुखी रहता है ।
- श्लोक 24जिसका सुख और आराम आन्तरिक है, और जो वास्तव में अन्तःकरण में प्रकाशमान है - ऐसा योगी, जिसने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, वह मोक्ष (ब्रह्म-निर्वाण) प्राप्त करता है ।
- श्लोक 25जिन ऋषियों के पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके संशय दूर हो गए हैं, जिन्होंने मन को वश में कर लिया है, और जो समस्त प्राणियों के कल्याण में रत हैं, वे ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करते हैं ।
- श्लोक 26जो तपस्वीजन काम एवं क्रोध से रहित हैं, जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है और जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार कर लिया है, उनके लिए जीवित रहते हुए तथा मृत्यु के पश्चात् भी ब्रह्मनिर्वाण विद्यमान है ।
- श्लोक 27-28बाह्य इन्द्रिय-विषयों के समस्त विचारों को बाहर निकालकर, नेत्रों की दृष्टि को भौंहों* के मध्य में केन्द्रित करके, तथा नासिका के भीतर और बाहर जाने वाले श्वास को नियन्त्रित करते हुए, जिस ऋषि ने अपने इन्द्रिय, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष प्राप्ति हेतु समर्पित है, और जो इच्छा, भय एवं क्रोध से रहित है, वह वास्तव में सदैव मुक्त है ।
- श्लोक 29मुझे समस्त यज्ञों एवं तपों का भोक्ता, समस्त लोकों* का महेश्वर तथा समस्त जीवों का सुहृद जानकर मनुष्य शान्ति प्राप्त करता है।