भ. गी. 5.22

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥

अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों के स्पर्श से उत्पन्न समस्त भोग दुःख के ही स्रोत हैं । इनका आदि और अन्त होता है । अतः विवेकशील मनुष्य इनमें रमण नहीं करते ।

वीडियो व्याख्याएँ देखें

अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ५.२१ ("बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्...") की व्याख्या के अनुसार, बाह्य विषयों से मिलने वाले सुख और 'अक्षय सुख' (आत्मिक सुख) में क्या मूलभूत अंतर बतलाया गया है, तथा टॉर्च (प्रकाश) और श्रीजीव गोस्वामी जी के कथन द्वारा चेतना की दिशा को कैसे समझाया गया है?

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।