भ. गी. 5.22
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों के स्पर्श से उत्पन्न समस्त भोग दुःख के ही स्रोत हैं । इनका आदि और अन्त होता है । अतः विवेकशील मनुष्य इनमें रमण नहीं करते ।
हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों के स्पर्श से उत्पन्न समस्त भोग दुःख के ही स्रोत हैं । इनका आदि और अन्त होता है । अतः विवेकशील मनुष्य इनमें रमण नहीं करते ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि इंद्रिय-विषयों का सुख सीमित और परिणाम में थका देने वाला होता है (जैसे अत्यधिक भोजन पचाने में शरीर की शक्ति लगती है), जबकि आत्मा/भगवान का सुख अक्षय है जो ताजगी देता है। अंधेरे में टॉर्च के दृष्टांत और श्रीजीव गोस्वामी जी की टीका (विषयाविष्टचित्तानां...) द्वारा वक्ता स्पष्ट करते हैं कि जैसे प्रकाश और अंधकार एक साथ नहीं रह सकते और पूर्व की वस्तु पश्चिम में नहीं ढूँढी जा सकती, वैसे ही बाह्य विषयों में आसक्त चित्त वाले को आध्यात्मिक आत्म-सुख प्राप्त नहीं हो सकता।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि बाह्य सुख और आध्यात्मिक सुख दोनों परस्पर विरोधी दिशाओं में हैं, अतः एक साथ दोनों की प्राप्ति असंभव है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ५.२२ के अनुसार इंद्रियों के स्पर्श से उत्पन्न समस्त भोग अनित्य (आदि-अंत वाले) और दुख के ही कारण हैं (दुःखयोनय एव ते)। वक्ता पतंजलि योगसूत्र का संदर्भ देकर बतलाते हैं कि विवेकी (बुद्धिमान) व्यक्ति जानता है कि विषय-भोग परिणाम-दुख (परिवर्तन), ताप-दुख (ईर्ष्या व रोग), संस्कार-दुख (पूर्व स्मृति की वेदना) और गुणों के वैषम्य के कारण केवल दुख का रूप हैं, इसलिए 'न तेषु रमते बुधः' (बुद्धिमान उनमें नहीं रमते)।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि बाह्य भोग दुख के ही कारण हैं और बुद्धिमान लोग इनमें रमण नहीं करते हैं।
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