भ. गी. 5.24

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥

अनुवाद

जिसका सुख और आराम आन्तरिक है, और जो वास्तव में अन्तःकरण में प्रकाशमान है - ऐसा योगी, जिसने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, वह मोक्ष (ब्रह्म-निर्वाण) प्राप्त करता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ५.२३ की व्याख्या में काम और क्रोध के वेग को 'सहन करने' (सोढुम्) तथा उसे 'दबाने' (सप्रेशन) के बीच क्या मूलभूत तात्विक अंतर बतलाया गया है?

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