श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
अनुवाद
श्रीभगवान् ने कहा - संन्यासी* एवं योगी वह व्यक्ति है जो फल की इच्छा किए बिना अपने नियत कर्म को करता है, न कि वह जो पवित्र अग्नि का त्याग कर देता है और न वह जो कर्म से दूर ही रहता है।
टिप्पणियाँ
* संन्यासी वह त्यागी है जो सभी भौतिक प्रयत्नों, संबंधों और संपत्तियों का त्याग करके परम सत्य को समर्पित जीवन जीता है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.१ ("अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः...") की व्याख्या के अनुसार, वास्तविक संन्यासी और योगी किसे बतलाया गया है, तथा 'निरग्नि' और 'अक्रिय' का क्या व्यावहारिक अर्थ समझाते हुए बाह्य परिवर्तन की तुलना में आंतरिक बदलाव की क्या महत्ता सिद्ध की गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि केवल वेश या स्थान बदल लेने और निष्क्रिय बैठने से कोई संन्यासी नहीं होता; तथा 'निरग्नि' का अर्थ अग्नि की पूजा करना नहीं बल्कि यज्ञ/भोजन हेतु अग्नि न जलाना है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार, केवल पवित्र अग्नि त्यागने (निरग्नि) या कर्तव्य कर्मों से दूर रहने (अक्रिय) मात्र से कोई संन्यासी या योगी नहीं बनता। संन्यास का मूल अर्थ आसक्ति का त्याग है। इसलिए जो कर्मफल पर आश्रित हुए बिना अपना कर्तव्य कर्म (कार्यं कर्म) करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है। भगवान पूरी गीता में बाह्य परिवर्तन (वेश, स्थान, तिलक) के स्थान पर अंतःकरण के आंतरिक बदलाव पर बल देते हैं।
भगवद्गीता के श्लोक ६.२ ("यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव...") की व्याख्या के अनुसार, संन्यास और योग में क्या तात्विक अभिन्नता बतलाई गई है, तथा 'असंन्यास्त संकल्प' व्यक्ति के योगी न बन पाने का क्या दार्शनिक कारण और 'संकल्प' का स्वरूप समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि जिसे संन्यास कहा गया है, वही योग है (यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि)। संन्यास में कर्मफल का त्याग है और योग में भी कर्मफल का ही त्याग है। इसके अतिरिक्त, जब इच्छा में अहंकार जुड़ जाता है कि "मुझे यह प्राप्त करके ही रहना है", तो वह संकल्प (Will power) बन जाता है। बिना इस संकल्प को छोड़े (न ह्यसंन्यास्तसंकल्पो योगी भवति) कोई भी व्यक्ति योगी नहीं बन सकता।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक ६.२ में स्पष्ट रूप से संन्यास और योग को एक माना गया है, तथा संकल्प का अर्थ अहंकारयुक्त फलाकांक्षा है जिसे छोड़े बिना योग संभव नहीं है।