ध्यानयोग
इस अध्याय में सैंतालीस श्लोक हैं । जिनमें पाञ्च श्लोक अर्जुन के द्वारा और बयालीस श्रीकृष्ण के द्वारा कहे गए हैं । अध्याय के प्रारम्भ में, श्रीकृष्ण कर्मयोग की ज्ञानयोग से श्रेष्ठता की पुष्टि करते हैं । यह मात्र सुनिश्चित करने के लिए है कि, अर्जुन अपने कर्मयोग के पथ पर दृढ है कि नहीं । तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ध्यान योग का विस्तार से विवरण करते हैं । अपितु यह एक भिन्न मार्ग है, परन्तु यदि इसे तीन मुख्य आध्यात्मिक मार्ग जैसे कर्म, ज्ञान और भक्ति योग में समाविष्ट किया जाय तो यह ध्यान मार्ग ज्ञानयोग में समाहित होता है ।
प्रथम श्लोक में श्रीकृष्ण एक ऐसे साधक, जो अपने कर्मफल की स्पृहा रहित कर्म करता है उसकी तुलना सन्न्यासी और योगी के साथ करते हैं । वे अपनी बुद्धि का उपयोग आध्यात्मिक उत्थान के लिए करने का निर्देश देते हैं, न कि पतन के लिए। अनियन्त्रित मन शत्रु के समान होता है, जबकि नियन्त्रित मन मित्रसम होता है (६) । जिस योगी का मन और इन्द्रियाँ वश में हैं, वह पाषाण, मिट्टी और सुवर्ण को समान रूप से देखता है (८) । वह सम्बन्धी, मित्र, शत्रु, उदासीन व्यक्ति, मध्यस्थी, सदाचारी और दुराचारी व्यक्ति (९) में कोई भेदभाव नहीं रखता है ।
श्रीकृष्ण मन को नियन्त्रित करने की प्रक्रिया (१०-१८) का वर्णन करते हैं और एक सिद्ध योगी (२०-२५) की विशेषताओं की रूपरेखा को दर्शाते हैं । वे सांसारिक कामनाओं का परित्याग कर धीरे-धीरे अपने मन को नियन्त्रण में लाने पर बल देते हैं (२६-२९) । इस प्रकार योगी आवेश और आलस से मुक्त होकर शान्ति को प्राप्त करता है । वे घोषणा करते हैं कि जो योगी मुझे सर्वत्र देखता है उसके लिए मैं कभी भी अदृश्यमान नहीं होता हूँ (३०) । श्रीकृष्ण ऐसे योगी (भक्त) को अनदेखा नहीं करते । श्रीकृष्ण यह कहकर निष्कर्ष देते हैं कि सर्वोच्च योगी जगत में समभाव से अनुकूल व प्रतिकूल परिस्थितियों (३१-३२) के मध्य कोई भेदभाव नहीं करता है ।
इस विषय में अर्जुन जिज्ञासा करता है कि मन अत्यधिक चञ्चल है, अतः ऐसी योगिक प्रक्रिया करना बहुत कठिन है (३३-३४) । अर्जुन के साथ सहमत होते हुए श्रीकृष्ण मन पर नियन्त्रण के लिए अभ्यास और वैराग्य का परामर्श देते हैं (३५) । वे कहते हैं कि मन के नियन्त्रण के बिना कोई भी योग में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है ।वह यह भी दर्शाते हैं कि "जिसका मन नियन्त्रित है और जो योग्य साधनों से निरन्तर प्रयास करता है, वही साधक इस योग को प्राप्त कर सकता है" (३६)।
अर्जुन पूछता है, "जो साधक योगमार्ग का आरम्भ श्रद्धा से करता है, पर पर्याप्त प्रयास नहीं कर पाता है, तथा जिसका मन योगमार्ग से चलित हो जाता है तो योग में पूर्णता अप्राप्य रहने पर उसकी क्या गति (३७-३९) होती है ॽ" । श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि योग अभ्यास से विचलित हो जाने पर भी साधक के लिए कुछ भी प्रतिकूल नहीं होता है । वह शुभ जन्म प्राप्त करेगा जो उसे पूर्व जन्म की योगिक भावना को पुनर्जीवित करने में सक्षम करेगा । कई जन्मों के बाद (धीरे धीरे विकसित होते हुए) वह योग में पूर्णता (४०-४५) प्राप्त करेगा । श्रीकृष्ण ने घोषणा की कि एक योगी तपस्वी, ज्ञानी और कर्मयोगी से श्रेष्ठतर है, अतः वे अर्जुन को योगी बनने का परामर्श देते हैं (४६) । सारांश में वे निष्कर्ष करते हैं कि जो उनकी श्रद्धापूर्वक भक्ति करता है वह सभी योगियों में सर्वश्रेष्ठ है (४७)।
सभी श्लोक
- श्लोक 1श्रीभगवान् ने कहा - संन्यासी* एवं योगी वह व्यक्ति है जो फल की इच्छा किए बिना अपने नियत कर्म को करता है, न कि वह जो पवित्र अग्नि का त्याग कर देता है और न वह जो कर्म से दूर ही रहता है।
- श्लोक 2हे अर्जुन, (कर्मफलों की इच्छा के त्याग रूपी) संन्यास को ही योग समझो। वास्तव में कर्मफल के सङ्कल्प का त्याग किये बिना कोई भी योगी नहीं हो सकता।
- श्लोक 3जो मुनि योग के मार्ग पर आरूढ़ होना चाहता है, उसके लिए कर्म (अर्थात् कर्मयोग) को साधन कहा गया है और विशेषतः जो योगारूढ़ हो चुका है, उसके लिए मन को ध्यान (अर्थात् शम) में स्थिर रखना साधन कहा गया है।
- श्लोक 4जब कोई व्यक्ति इन्द्रिय-विषयों से एवं उनके भोग की ओर ले जाने वाले कर्मों से वास्तव में अनासक्त हो जाता है, तब ऐसे समस्त सङ्कल्पों के त्यागी को योगारूढ़ अवस्था प्राप्त कहा जाता है।
- श्लोक 5मन के द्वारा आत्मा का उद्धार करना चाहिए और कभी उसका पतन नहीं होने देना चाहिए क्योंकि मन ही आत्मा का मित्र है एवं शत्रु भी है।
- श्लोक 6जिसने बुद्धि से अपने मन को जीत लिया है, विशेष रूप से उसके लिए मन मित्र है परन्तु जिसका मन वश में नहीं है, उसका मन ही शत्रु की तरह विरुद्ध व्यवहार करता है।
- श्लोक 7जिस योगी ने अपने मन को जीत लिया है और जो पूर्ण रूप से शान्त है, उसका मन परमात्मा में ध्यानपूर्वक स्थिर रहता है – चाहे गर्मी हो या ठण्ड, सुख हो या दुःख, मान हो या अपमान।
- श्लोक 8जिस व्यक्ति का हृदय ज्ञान और प्रत्यक्ष अनुभूति द्वारा सन्तुष्ट है, जो प्रत्येक परिस्थिति में स्थिर रहता है, जिसकी इन्द्रियाँ नियन्त्रित हैं, और जो मिट्टी के ढेले, पत्थर एवं स्वर्ण के टुकड़े को समान दृष्टि से देखता है – ऐसा योग द्वारा परमात्मा से युक्त व्यक्ति योगी कहलाता है।
- श्लोक 9जो व्यक्ति शुभचिन्तक, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष-पात्र, सम्बन्धी, पुण्यशाली और यहाँ तक कि पापियों – सभी को समान दृष्टि से देखता है, वह योग में अत्यन्त सिद्ध माना जाता है।
- श्लोक 10योगी को अकेले ही निर्जन स्थान में निरन्तर रहते हुए, मन और शरीर को संयमित करके, इच्छाओं से रहित और परिग्रह की मानसिकता से मुक्त होकर, अपने मन को ध्यानमग्न करना चाहिए।
- श्लोक 11-12स्वच्छ और पवित्र स्थान में योगी को स्थिर आसन स्थापित करना चाहिए जो न अधिक ऊँचा हो एवं न अधिक नीचा हो और जो कुश घास से बना हो, जिसे मृगचर्म और मुलायम कपड़े से ढका गया हो। उस आसन पर बैठकर मन को एक बिन्दु पर स्थिर करते हुए, मन और इन्द्रियों को संयमित करके, उसे हृदय की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करना चाहिए।
- श्लोक 13-14शरीर, सिर और गर्दन को सीधा तथा अचल रखते हुए, स्थिर रहकर, दृष्टि को नाक के अग्रभाग पर टिकाए हुए, बिना इधर-उधर देखे, मन को शान्त रखते हुए, भयमुक्त होकर, ब्रह्मचर्य व्रत का दृढ़ता से पालन करते हुए, मन को संयमित कर मुझमें स्थिर करके, केवल मेरा परायण होकर, योगी को मुझमें पूर्णतया ध्यान-मग्न रहते हुए बैठना चाहिए।
- श्लोक 15इस प्रकार अपना मन निरन्तर मुझमें ध्यानपूर्वक स्थिर रखकर मन को संयमित करने वाला योगी परम मुक्ति (ब्रह्मनिर्वाण) रूपी शान्ति को प्राप्त करता है और मेरे धाम पहुँच जाता है।
- श्लोक 16हे अर्जुन, जो व्यक्ति अत्यधिक खाता है या अत्यधिक उपवास करता है, और जो अत्यधिक सोता है या अत्यधिक जागरण करता है, ऐसे व्यक्ति के लिए योगाभ्यास का प्रश्न ही नहीं उठता।
- श्लोक 17जो व्यक्ति भोजन एवं मनोरञ्जन में संयमित है, कर्मों के पालन में व्यवस्थित है, और सोने-जागने में भी सन्तुलित है, ऐसे व्यक्ति का योगाभ्यास समस्त दुःखों का नाश कर देता है।
- श्लोक 18जब अनुशासित मन केवल आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और मनुष्य सभी प्रकार के इन्द्रिय-भोग की आकांक्षा से मुक्त हो जाता है, तब वह युक्त कहलाता है – अर्थात् वह योग में दृढ़तापूर्वक स्थित होता है।
- श्लोक 19जिस प्रकार स्पन्दन-रहित वायु के स्थान में रखी हुई दीपक की लौ विचलित नहीं होती है, उसी प्रकार योगी, जिसका मन नियन्त्रित होता है, वह अविचल रूप से आत्मा पर ध्यान में स्थित रहता है। इस विषय में यही उपमा दी गई है।
- श्लोक 20उस ध्यानात्मक आवेश की अवस्था में ध्यान के अभ्यास द्वारा अनुशासित मन पूर्णतः शान्त हो जाता है। उस अवस्था में निर्मल मन के द्वारा आत्मा का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करते हुए साधक केवल आत्मा में ही आनन्द का अनुभव करता है।
- श्लोक 21उस अवस्था में योगी उस शाश्वत सुख का अनुभव करता है जो बाह्य इन्द्रियों की पहुँच से परे है और केवल (आत्मा के स्वरूप से युक्त) बुद्धि के द्वारा ही ग्राह्य है। उस अवस्था में स्थित होकर वह परम सत्य से किञ्चित् भी विचलित नहीं होता है।
- श्लोक 22उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर मनुष्य किसी भी अन्य लाभ को उससे अधिक नहीं मानता है और उसमें स्थित होकर वह भीषण दुःख में भी विचलित नहीं होता है।
- श्लोक 23उस अवस्था को, जिसमें दुःख का कोई संयोग नहीं होता है, उसी को तुम योग जानो। इस योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय के साथ तथा निराशा रहित होकर करना चाहिए।
- श्लोक 24संकल्प से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूर्णतः त्याग कर केवल मन के द्वारा समस्त इन्द्रियों को सभी ओर से पूर्णतः वश में कर लेना चाहिए।
- श्लोक 25धारणा द्वारा दृढ़ की गई बुद्धि के माध्यम से मन को आत्मा में स्थिर करके अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करते हुए मन को धीरे-धीरे शान्त करना चाहिए।
- श्लोक 26चञ्चल एवं अस्थिर मन जहाँ भी भटकता हो उसे वहाँ से हटाकर केवल स्वयं के वश में लाना चाहिए।
- श्लोक 27जिसका मन शान्त है, जो निष्पाप है, जिसकी रजोगुणात्मक वृत्तियाँ शान्त हो चुकी हैं, और जो ब्रह्म में स्थित है, विशेष रूप से उस योगी को परम आनन्द की प्राप्ति होती है ।
- श्लोक 28इस प्रकार पूर्णतः पाप से मुक्त होकर और सदा अपने मन को संयमित रखते हुए योगी सहज ही ब्रह्म के प्रत्यक्ष साक्षात्कार का शाश्वत आनन्द अनुभव करता है।
- श्लोक 29जिस योगी का मन योग के द्वारा परम सत्य में लीन हो चुका है और जो सर्वत्र परम सत्य का दर्शन करता है, वह समस्त प्राणियों में परमात्मा का तथा परमात्मा में समस्त प्राणियों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है।
- श्लोक 30जो मुझे सर्वत्र देखता है और यह देखता है कि समस्त वस्तुएँ मुझमें स्थित हैं, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह भी मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है।
- श्लोक 31जो योगी एकत्व की दृष्टि में स्थित होकर समस्त प्राणियों में निवास करने वाले मुझको भजता है, वह सभी परिस्थितियों में मुझमें ही स्थित रहता है।
- श्लोक 32हे अर्जुन! मेरे मत में, जो अपने साथ तुलना करके समस्त जीवों के सुख और दुःख को समान देखता है, वह सर्वोत्तम योगी है ।
- श्लोक 33अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! आपने इस योग को साम्यता की अवस्था के रूप में वर्णित किया है परन्तु मन के चञ्चल स्वभाव के कारण मुझे यह अवस्था स्थिर नहीं लगती है।
- श्लोक 34हे कृष्ण! चूँकि मन स्वभाव से चञ्चल, उद्वेगकारी, प्रबल और हठी है, मैं इसका निग्रह वायु के समान अत्यन्त कठिन मानता हूँ।
- श्लोक 35श्रीभगवान् ने कहा – हे महाबाहो! इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मन चञ्चल है और उसे वश में करना अत्यन्त कठिन है। परन्तु हे कुन्तीपुत्र! अभ्यास एवं वैराग्य के द्वारा उसे नियन्त्रित किया जा सकता है।
- श्लोक 36मेरे मत में, असंयमित मन वाले व्यक्ति के लिए योग दुष्प्राप्य है; परन्तु जिसका मन वश में है और जो उचित उपायों से प्रयत्न करता है, वह इसे प्राप्त कर सकता है।
- श्लोक 37अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण! जो श्रद्धा से योग-पथ में प्रविष्ट है, परन्तु पर्याप्त यत्न नहीं करता है और जिसका मन योग-पथ से विचलित हो जाता है, ऐसे व्यक्ति के लिए योग-सिद्धि प्राप्य नहीं है। वह किस गति को प्राप्त होता है ?
- श्लोक 38हे महाबाहो! जो योग और कर्म दोनों से ही भ्रष्ट हो गया है, जिसका कोई आश्रय नहीं है और जो ब्रह्म के मार्ग पर भ्रमित हो गया है, क्या ऐसा व्यक्ति बिखरे हुए बादल की भाँति नष्ट नहीं हो जाता?
- श्लोक 39हे कृष्ण! मेरे इस संशय का पूर्ण रूप से निवारण करना आपके लिए उचित है, क्योंकि आपके अतिरिक्त इसका पूर्ण निवारण करने में कोई भी सक्षम नहीं है।
- श्लोक 40श्रीभगवान् ने कहा—हे पार्थ! ऐसे व्यक्ति का न तो इस जन्म में और न ही अगले जन्म में विनाश होता है, क्योंकि हे मेरे प्रिय! जो परम कल्याण के लिए प्रयत्न करता है, वह कभी दुर्गति प्राप्त नहीं करता है।
- श्लोक 41जो योग-पथ से भ्रष्ट हो जाता है, वह उन लोकों को प्राप्त करता है जिन्हें पुण्यकर्म करने वालों ने पूर्व में प्राप्त किया था। अनेक वर्षों तक वहाँ वास करने के पश्चात, वह पुनः पुण्यशाली एवं समृद्ध व्यक्तियों के घर में जन्म लेता है।
- श्लोक 42अथवा (दीर्घकाल तक योग-अभ्यास करने पर भी यदि योगी अपने प्रयत्न में असफल रहे), तो उसका जन्म विशेष रूप से योग में दृढ़तापूर्वक स्थित तथा ज्ञान से सम्पन्न व्यक्तियों के कुल में होता है। इस संसार में ऐसा जन्म वास्तव में अत्यन्त दुर्लभ है।
- श्लोक 43हे कुरुवंशी! उन दोनों में से किसी भी जन्म में पूर्वजन्म में प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान के साथ उसका पुनः संयोग हो जाता है, और तत्पश्चात वह सिद्धि प्राप्त करने हेतु नवीन उत्साह से प्रयत्न करता है।
- श्लोक 44निश्चय ही वह अपने पूर्वजन्म में किए गए अभ्यास के प्रभाव से बिना चाहे भी पुनः (योग की ओर) आकर्षित हो जाता है। जो साधक योग के विषय में केवल जिज्ञासु है, वह भी वेदों में वर्णित कर्मकाण्ड के मार्ग को पार कर लेता है।
- श्लोक 45परन्तु जो योगी दृढ़ता से अभ्यास करता है, वह समस्त पापों से शुद्ध होकर अनेक जन्मों* के बाद सिद्धि प्राप्त करता है और तत्पश्चात परम गति को प्राप्त होता है।
- श्लोक 46जो योगी [परमात्मा पर ध्यान करता है], वह तपस्वियों से श्रेष्ठ है, [सकाम] कर्म में प्रवृत्त व्यक्तियों से श्रेष्ठ है एवं ब्रह्मज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है। यही मेरा मत है। अतएव हे अर्जुन! तुम योगी बनो।
- श्लोक 47समस्त योगियों में भी, वह श्रद्धालु जो अपने मन को पूर्णतः मुझमें एकाग्र करके मेरी उपासना करता है, मैं उसे योगयुक्त व्यक्तियों में सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।