भ. गी. 6.31
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
अनुवाद
जो योगी एकत्व की दृष्टि में स्थित होकर समस्त प्राणियों में निवास करने वाले मुझको भजता है, वह सभी परिस्थितियों में मुझमें ही स्थित रहता है।
जो योगी एकत्व की दृष्टि में स्थित होकर समस्त प्राणियों में निवास करने वाले मुझको भजता है, वह सभी परिस्थितियों में मुझमें ही स्थित रहता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान सर्वव्यापी हैं, न कि केवल एक स्थान विशेष में सीमित, और भगवान स्वयं ही संसार के उपादान व निमित्त कारण हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान को देखने के लिए भक्ति रूपी योग्यता/दृष्टि की आवश्यकता होती है, जिससे भक्त सर्वत्र भगवान का दर्शन करता है और सब कुछ भगवान में स्थित देखता है । साधारण शिल्पी (जैसे सुनार या कुम्हार) केवल 'निमित्त कारण' होते हैं और उनकी सामग्री बाहर से आती है, किंतु भगवान मकड़ी की भाँति 'निमित्त कारण' (बनाने वाले) और 'उपादान कारण' (सामग्री) दोनों स्वयं ही हैं । अतः संपूर्ण जगत् भगवान की ही शक्ति का विस्तार है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता श्लोक ६.३१ के संदर्भ में बतलाते हैं कि 'एकत्वम् आस्थितः' का अर्थ प्रेम के कारण होने वाली प्रगाढ़ एकता है, जो भक्ति द्वारा सिद्ध होती है । समस्त दुखों, भय और द्वेष का मूल कारण अविद्या से उत्पन्न 'भिन्न भाव' (पृथक भाव) है । जब साधक सर्वभूतों में स्थित भगवान की दृष्टि रखता है, तो द्वेष मिट जाता है और वह चाहे जैसी भी परिस्थिति में हो, सर्वथा भगवान में ही स्थित रहता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि समदर्शी होने पर भी समवर्ती होने की मनाही है (व्यावहारिक सुरक्षा व मर्यादा आवश्यक है) और एकत्व की दृष्टि द्वेष को समाप्त करती है, न कि बढ़ाती है।
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