भ. गी. 6.33

अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥

अनुवाद

अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! आपने इस योग को साम्यता की अवस्था के रूप में वर्णित किया है परन्तु मन के चञ्चल स्वभाव के कारण मुझे यह अवस्था स्थिर नहीं लगती है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.३२ ("आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन...") की व्याख्या के अनुसार, 'सर्वोत्तम/परम योगी' (परमो मतः) किसे कहा गया है, तथा 'समानुभूति' (Empathy) और 'अपने शरीर/अंगों' के दृष्टांत से इसे कैसे समझाया गया है?

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