श्रीभगवान् ने कहा – हे महाबाहो! इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मन चञ्चल है और उसे वश में करना अत्यन्त कठिन है। परन्तु हे कुन्तीपुत्र! अभ्यास एवं वैराग्य के द्वारा उसे नियन्त्रित किया जा सकता है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.३४ ("चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्...") की व्याख्या के अनुसार, अर्जुन द्वारा मन के कौन-से चार मुख्य विशेषण बतलाए गए हैं, तथा मन की नियंत्रण-हीनता को समझाने के लिए 'वायु' (वायुनेव सुदुष्करम्) और 'दही की मथानी' (प्रमाथि) का क्या सुंदर दृष्टांत दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि अर्जुन ने मन को कमजोर या शांत नहीं बल्कि बलवान, हठी और अति-चंचल बतलाया है।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.३४ में अर्जुन मन के चार लक्षण बतलाते हैं—चंचल, प्रमाथि, बलवत् और दृढ़म्। व्याख्यान के अनुसार 'प्रमाथि' का अर्थ है जैसे दही में मथानी इधर-उधर बिलोकर हलचल मचाती है, वैसे ही मन व्यक्ति को व्याकुल रखता है। 'वायोरिव सुदुष्करम्' का अर्थ है कि जैसे निराकार वायु को मुट्ठी में नहीं बाँधा जा सकता, वैसे ही अदृश्य व हठी मन को केवल भौतिक शक्ति से रोकना असंभव प्रतीत होता है।
भगवद्गीता के श्लोक ६.३५ ("असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के संशय को स्वीकार करते हुए मन-नियंत्रण के कौन-से दो मुख्य उपाय बतलाए हैं, तथा 'वैद्य, औषधि और परहेज' के दृष्टांत से इसे कैसे समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.३५ में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'महाबाहु' कहकर संबोधित करते हैं और स्वीकार करते हैं कि मन निश्चित ही दुर्निग्रह है, किंतु 'अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते' के अनुसार अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है । वक्ता आयुर्वेद के वैद्य का उदाहरण देते हैं कि जैसे रोग ठीक करने के लिए दवा (अभ्यास) के साथ परहेज (वैराग्य - रोग बढ़ाने वाले कारणों का त्याग) आवश्यक है, वैसे ही अध्यात्म में साधना और वासना-त्याग दोनों साथ चलने चाहिए ।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि भगवान अर्जुन की बात को काटते नहीं बल्कि स्वीकारते हैं, और अभ्यास को साधना तथा वैराग्य को परहेज/त्याग का रूपक बतलाया गया है]।