भ. गी. 6.35

श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

अनुवाद

श्रीभगवान् ने कहा – हे महाबाहो! इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मन चञ्चल है और उसे वश में करना अत्यन्त कठिन है। परन्तु हे कुन्तीपुत्र! अभ्यास एवं वैराग्य के द्वारा उसे नियन्त्रित किया जा सकता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.३४ ("चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्...") की व्याख्या के अनुसार, अर्जुन द्वारा मन के कौन-से चार मुख्य विशेषण बतलाए गए हैं, तथा मन की नियंत्रण-हीनता को समझाने के लिए 'वायु' (वायुनेव सुदुष्करम्) और 'दही की मथानी' (प्रमाथि) का क्या सुंदर दृष्टांत दिया गया है?

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