भ. गी. 7.1

श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥

अनुवाद

श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन! मुझमें आसक्त मन से, मेरी शरण लेते हुए और योग का अभ्यास करते हुए, तुम मुझे सम्पूर्ण रूप से एवं बिना किसी संदेह के कैसे जान सकोगे यह सुनो।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के सातवें अध्याय के पहले श्लोक ("मय्यासक्तमनाः पार्थ...") की व्याख्या में दिए गए गीता रूपी बक्से के रूपक, तथा संसार और भक्ति में 'आश्रय' और 'आसक्ति' के मनोविज्ञान का क्या अंतर बतलाया गया है?

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