श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन! मुझमें आसक्त मन से, मेरी शरण लेते हुए और योग का अभ्यास करते हुए, तुम मुझे सम्पूर्ण रूप से एवं बिना किसी संदेह के कैसे जान सकोगे यह सुनो।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के पहले श्लोक ("मय्यासक्तमनाः पार्थ...") की व्याख्या में दिए गए गीता रूपी बक्से के रूपक, तथा संसार और भक्ति में 'आश्रय' और 'आसक्ति' के मनोविज्ञान का क्या अंतर बतलाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी बतलाते हैं कि गीता रूपी बक्से में भक्ति योग मध्य का परम रत्न है। इसके साथ ही, सांसारिक जीवन में व्यक्ति का आश्रय धन या जीविका होता है और आसक्ति परिवार में रहती है, किंतु वास्तविक भक्ति में आश्रय और आसक्ति दोनों का एक ही विषय (भगवान) होना अनिवार्य बतलाया गया है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भक्ति योग को मध्य का रत्न बतलाया गया है, और भक्ति में आश्रय व आसक्ति दोनों भगवान ही होने चाहिए।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के दूसरे श्लोक ("ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम्...") की व्याख्या के अनुसार, 'ज्ञान' और 'विज्ञान' का क्या अर्थ बतलाया गया है, तथा छान्दोग्य उपनिषद के आरुणि और उनके पुत्र श्वेतकेतु के प्रसंग द्वारा 'जिसे जानकर कुछ शेष नहीं रहता' का क्या सिद्धांत समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता के अनुसार ज्ञान सैद्धांतिक/स्वरूप का बोध है और विज्ञान उसका प्रत्यक्ष अनुभव व विभूति-ज्ञान है। आरुणि द्वारा श्वेतकेतु से पूछे गए प्रश्न का उदाहरण देकर बतलाया गया है कि जैसे मूल कारण (सोने) को जानने पर उसके सभी कार्यों का बोध हो जाता है, वैसे ही सर्व-कारण-कारण भगवान को जानने पर सब कुछ जान लिया जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि यहाँ आध्यात्मिक ज्ञान व भगवद्-साक्षात्कार की बात है, न कि केवल भौतिक विज्ञान या लौकिक व्याकरण की।