विज्ञानयोग

यह छह अध्यायरूपी दूसरे विभाग का आरम्भिक अध्याय है । इस विभाग मे जब भक्त भगवान का ध्यान करता है, तो वह उनमें तन्मय हो जाता है एवं भगवान भी भक्त-परायण हो जाते हैं । अर्जुन के लिए विशेष अनुग्रह एवं स्नेह से युक्त श्रीकृष्ण अर्जुन के बिना प्रश्न पूछे ही भक्ति का वर्णन करते हुए इस अध्याय का प्रारम्भ करते हैं ।

इस अध्याय में भक्तियोग का सार दिया गया है । इस अध्याय में तीस श्लोक हैं, जो सभी श्रीकृष्ण द्वारा बोले गए हैं । श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (अर्थात् उपासना से प्राप्त अनुभव) (२) की व्याख्या करते हैं । गिने-चुने लोग ही ज्ञानमार्ग (मोक्ष-मार्ग) पर चलते हैं (३) । अधिकांश लोग केवल जीवन चलाने में या भोगविलास में ही लीन रहते हैं । तथापि, ऐसे सहस्र मुमुक्षुओं में से, कोई कदाचित् ही श्रीकृष्ण को वास्तव में जानने का दृढ़ निश्चय से प्रयास करता है । नौ श्लोकों में श्रीकृष्ण निर्देश करते हैं कि कैसे वे हर वस्तु के स्रोत और बहिरङ्ग शक्ति (माया) के स्वामी हैं । यह बहिरङ्ग शक्ति पाञ्च महाभूत (भूमि, जल, वायु, अग्नि, तथा आकाश) के सहित मन, बुद्धि और अहङ्कार के रूप में प्रकट होती है । श्रीकृष्ण की दूसरी शक्ति चेतन जीव है जिसके लिए यह सारा ब्रह्मांड विकसित हुआ है (४-७) ।

श्रीकृष्ण ही सब का सार हैं । वे जल में रस, पृथ्वी में सुगन्ध, और सूर्य और चन्द्रमा में प्रकाश हैं (८-९) । वास्तव में, सब कुछ उन्हीं से उद्भूत होता है और उन्हीं में लीन हो जाता है । तथापि लोग उनके विषय में क्यों नहीं जानते ? श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि यह उनकी माया (बहिरङ्ग शक्ति) के प्रभाव के कारण है, जिसमें तीन प्राकृतिक गुण (१३) हैं । केवल जो उनके प्रति आत्म-समर्पण करते हैं, वे ही उनकी माया को पार कर सकते हैं (१४) । जो अज्ञानी हैं, वे उन्हें समर्पण नहीं करते हैं (१५) । इसके विपरीत, वे ज्ञानीजन जो अनेक जन्मों के पश्चात् उनकी शरण में आते हैं, वे उन्हें प्रिय हैं और ऐसे ज्ञानीजन अत्यन्त दुर्लभ हैं (१९) ।

कामना से विवेक भ्रष्ट लोग, अन्य देवी-देवताओं की पूजा तुच्छ लक्ष्य (भोगविलास की कामनापूर्ति) की प्राप्ति के लिए करते हैं (२०-२३) । जो इस जगत में जो द्वैतातीत या द्वन्द्व रहित एवं भ्रम से मुक्त हैं और जिन के कुकर्म समाप्त हो गए हैं, वे ही श्रीकृष्ण को दृढ़ श्रद्धा से पूजते हैं (२८) । परमेश्वर की अनुभूति में ऐसे योगी उनके प्रति सदा सचेत रहते हैं । श्रीकृष्ण अध्याय के अन्त में अपनी विविध शक्तियों का वर्णन करते हुए इस निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं कि,: "जो लोग वृद्धावस्था व मृत्यु से मुक्ति के लिए साधना करते हैं, वे मेरी शरण ग्रहण करके अध्यात्म, पूर्ण लौकिकता या अधिभूत ब्रह्मांडीय शासन या अधिदैव और अखिलकर्म के प्रेरक (अधियज्ञ)) तथा परमब्रह्म का अनुभव करते हैं। साथ ही जिनके चित्त दृढ़ श्रद्धा से मुझमें स्थापित हैं, वे मृत्यु के समय भी मेरा स्मरण करते हैं" (२९-३०) । आठवें अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन के प्रश्नोत्तर में प्रयुक्त पारिभाषिक संस्कृत शब्दों की व्याख्या की गई है ।

सभी श्लोक

  1. श्लोक 1श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन! मुझमें आसक्त मन से, मेरी शरण लेते हुए और योग का अभ्यास करते हुए, तुम मुझे सम्पूर्ण रूप से एवं बिना किसी संदेह के कैसे जान सकोगे यह सुनो।
  2. श्लोक 2इस ज्ञान को इसके प्रत्यक्ष बोेध की प्रक्रिया सहित पूर्ण रूप से मैं तुम्हें प्रकट करूँगा। इसे जानकर इस संसार में अन्य कुछ भी जानना शेष नहीं रहता है।
  3. श्लोक 3सहस्रों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है । उन साधकों में यहाँ तक कि सिद्धों में भी कोई विरला ही मुझे तत्त्वतः जानता है।
  4. श्लोक 4मेरी भौतिक शक्ति (प्रकृति) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि एवं अहंकार के रूप में आठ भागों में विभक्त है।
  5. श्लोक 5हे महाबाहो! यह मेरी अपरा प्रकृति है। परन्तु जानो कि इससे भिन्न मेरी परा प्रकृति है, जो जीव से बनी है और जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।
  6. श्लोक 6यह जान लो कि ये दोनों प्रकृतियाँ समस्त प्राणियों का मूल हैं। मैं इस सम्पूर्ण जगत् का स्रष्टा तथा प्रलय हूँ।
  7. श्लोक 7हे अर्जुन! मुझसे श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें उसी प्रकार पिरोया हुआ है जैसे सूत्र में मणियाँ पिरोई रहती हैं।
  8. श्लोक 8हे कुन्तीपुत्र! मैं जल में स्वाद हूँ, चन्द्रमा एवं सूर्य में प्रकाश हूँ, समस्त वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ, आकाश में शब्द हूँ, और मनुष्यों में पराक्रम हूँ।
  9. श्लोक 9पृथ्वी में मैं पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ। मैं समस्त प्राणियों में जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।
  10. श्लोक 10हे पार्थ! मुझे समस्त प्राणियों का सनातन बीज जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ और तेजस्वियों का तेज हूँ।
  11. श्लोक 11हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का वह बल हूँ जो काम और राग से रहित है, और मनुष्यों में वह काम हूँ जो शास्त्रविधि के विरुद्ध नहीं है।
  12. श्लोक 12जो भी मानसिक अवस्थाएँ, चाहे वे प्रकाशमय (सात्त्विक), गतिशील (राजसिक) अथवा जड़तामय (तामसिक) प्रकृति की हों, उन सबको केवल मुझसे ही उत्पन्न जानो। मैं उन गुणों और उनसे उत्पन्न होने वाली मानसिक अवस्थाओं के अधीन नहीं हूँ; बल्कि वे सभी मेरे अधीन हैं।
  13. श्लोक 13प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न इन भावों से मोहित होकर, यह सम्पूर्ण जगत् इनसे परे और अव्यय मुझे नहीं जान पाता है।
  14. श्लोक 14मेरी इस तीन गुणों से बनी दैवी बहिरंगा माया को पार करना वास्तव में अत्यन्त कठिन है परन्तु जो केवल मेरी शरण लेते हैं वे इस माया को पार कर जाते हैं।
  15. श्लोक 15जिनमें किञ्चित् भी विवेक नहीं है, जो मनुष्यों में अधम हैं, जिनका ज्ञान माया ने हर लिया है, और जिन्होंने भौतिकवादी (आसुरी*) स्वभाव को अपना लिया है, ऐसे दुष्कर्मी मेरी शरण नहीं लेते हैं।
  16. श्लोक 16हे अर्जुन! चार प्रकार के पुण्यशाली व्यक्ति मेरी उपासना करते हैं – दुःखी, तत्त्व-जिज्ञासु, अर्थ की कामना करने वाले और ज्ञानी, हे भरतश्रेष्ठ!
  17. श्लोक 17इनमें से सदा मुझसे युक्त रहने वाला और अनन्य भक्ति से सम्पन्न ज्ञानी श्रेष्ठ है। निश्चय ही मैं उस ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।
  18. श्लोक 18ये सभी निःसन्देह उदार हैं परन्तु ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है । यह मेरा मत है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अपने मन को मुझमें स्थिर करके केवल मुझे ही परम लक्ष्य मानते हुए मेरी शरण ले चुका है।
  19. श्लोक 19अनेक जन्मों के पश्चात् जो इस ज्ञान से युक्त होता है कि वासुदेव* ही सर्वस्व हैं, वह मेरी शरण लेता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
  20. श्लोक 20जिनका विवेक विभिन्न कामनाओं द्वारा हर लिया गया है, वे अन्य देवताओं की शरण लेते हैं। उन से सम्बन्धित विभिन्न नियमों का पालन कर वे अपने स्वभाव से नियन्त्रित होते हैं ।
  21. श्लोक 21जो भक्त जिस रूप की श्रद्धा के साथ उपासना करना चाहता है, उस देवता के प्रति मैं उसे दृढ़ श्रद्धा प्रदान करता हूँ।
  22. श्लोक 22उस श्रद्धा से युक्त होकर वह भक्त उस देवता की आराधना करता है और उसके माध्यम से मनोवांछित वरदान प्राप्त करता है, जो वास्तव में केवल मेरे ही द्वारा प्रदान किए जाते हैं।
  23. श्लोक 23परन्तु इन अल्पबुद्धि मनुष्यों को प्राप्त फल नश्वर होता है। देवताओं के उपासक देवताओं को प्राप्त करते हैं जबकि मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त करते हैं।
  24. श्लोक 24अविवेकी मनुष्य मेरे अव्यय एवं सर्वोत्कृष्ट परम भाव को न जानते हुए मुझे निराकार अव्यक्त ब्रह्म का केवल एक दृश्यमान प्राकट्य समझ लेते हैं।
  25. श्लोक 25दिव्य शक्ति (योगमाया) से आवृत मैं सभी के लिए प्रकट नहीं हूँ। इसलिए यह मोहित संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता है।
  26. श्लोक 26हे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ परन्तु मुझे कोई नहीं जानता है।
  27. श्लोक 27हे भारत! हे शत्रुओं को दग्ध करने वाले! इच्छा एवं द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व के मोह के कारण सभी प्राणी जन्म से ही सम्मोहित रहते हैं।
  28. श्लोक 28परन्तु जो मनुष्य पुण्यकर्मी हैं और जिनके पाप समाप्त हो गए हैं वे द्वन्द्व के मोह से मुक्त होकर दृढ़ संकल्प के साथ मेरी उपासना करते हैं।
  29. श्लोक 29जो मेरी शरण लेकर वृद्धावस्था एवं मृत्यु से मुक्ति के लिए प्रयत्न करते हैं, वे ब्रह्म को, सम्पूर्ण आत्मतत्त्व (अध्यात्म) को, और कर्म को उसकी समग्रता में साक्षात्कार कर लेते हैं।
  30. श्लोक 30जिन्होंने मुझे अधिभूत (भौतिक तत्त्व), अधिदैव (ब्रह्माण्ड का शासन) तथा अधियज्ञ (क्रिया के अन्तःस्थ प्रेरक) के तत्त्व सहित जान लिया है, और जिनका चित्त मुझमें दृढ़तापूर्वक स्थित है, वे मृत्यु के समय भी मेरे प्रति सचेत रहते हैं।

प्रश्न

इस अध्याय के मुख्य प्रश्न