भ. गी. 7.22
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥
अनुवाद
उस श्रद्धा से युक्त होकर वह भक्त उस देवता की आराधना करता है और उसके माध्यम से मनोवांछित वरदान प्राप्त करता है, जो वास्तव में केवल मेरे ही द्वारा प्रदान किए जाते हैं।
उस श्रद्धा से युक्त होकर वह भक्त उस देवता की आराधना करता है और उसके माध्यम से मनोवांछित वरदान प्राप्त करता है, जो वास्तव में केवल मेरे ही द्वारा प्रदान किए जाते हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान सर्वसुहृद् व विशाल हृदय वाले हैं, और श्रद्धा मनुष्य को साधन में निष्ठापूर्वक लगाती है, जबकि साधारण विश्वास केवल दिखावा मात्र हो सकता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बतलाते हैं कि मनुष्य के अंतःकरण में बैठी कामनाएँ केवल यह कहने से नहीं मिटतीं कि संसार अनित्य है। यदि उन्हें रोका जाए तो वे अधार्मिक मार्ग पर जा सकते हैं। इसलिए भगवान दयालु होकर देवताओं की पूजा के नियमों द्वारा उनमें शास्त्र-श्रद्धा का संस्कार डालते हैं। इसके साथ ही, साधारण 'विश्वास' निष्क्रिय होता है जिसमें संशय बने रहते हैं, जबकि 'श्रद्धा' हृदय का प्रगाढ़ भाव है जो मनुष्य को साधना में प्रवृत्त करता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान ने उन्हें निर्बुद्धि नहीं कहा है, और देवताओं के उपासक अनित्य फल पाते हैं जबकि भगवान के भक्त अनित्य फल के बजाय भगवान को प्राप्त करते हैं।
विकल्प ख (सही): श्लोक में भगवान बतलाते हैं कि अल्प-बुद्धि वाले मनुष्यों को मिलने वाला फल नश्वर होता है क्योंकि देवता और उनके स्थान (जैसे स्वर्ग) समय-बद्ध व नश्वर हैं। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि भगवान ने उन्हें 'निर्बुद्धि' नहीं बल्कि 'अल्पमेध' (कम बुद्धि वाले) कहा है जिन्हें सही दिशा दी जा सकती है। देवताओं के उपासक अनित्य लोकों को जाते हैं, जबकि भगवान के भक्त अनित्य प्रयासों से भी नित्य परमेश्वर को ही प्राप्त करते हैं।
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