भ. गी. 7.27
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
अनुवाद
हे भारत! हे शत्रुओं को दग्ध करने वाले! इच्छा एवं द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व के मोह के कारण सभी प्राणी जन्म से ही सम्मोहित रहते हैं।