भ. गी. 7.8
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! मैं जल में स्वाद हूँ, चन्द्रमा एवं सूर्य में प्रकाश हूँ, समस्त वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ, आकाश में शब्द हूँ, और मनुष्यों में पराक्रम हूँ।
हे कुन्तीपुत्र! मैं जल में स्वाद हूँ, चन्द्रमा एवं सूर्य में प्रकाश हूँ, समस्त वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ, आकाश में शब्द हूँ, और मनुष्यों में पराक्रम हूँ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार जल का मूल गुण रस है और 'रसो वै सः' के अनुसार भगवान ही रस रूप हैं। वेदों का मूल बीज प्रणव (ओंकार) है। पद्म पुराण का उद्धरण देते हुए वक्ता बतलाते हैं कि ओंकार के 'अकार' से विष्णु, 'उकार' से लक्ष्मी और 'मकार' से जीव को भगवान का दास सिद्ध किया गया है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि जल में रस भगवान का ही स्वरूप है, और प्रणव का पद्म पुराण में अर्थ विष्णु, लक्ष्मी तथा जीव के संबंध के रूप में दिया गया है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि अग्नि केवल एक प्रकार की नहीं होती, और केवल शरीर को कष्ट देना गीता के अनुसार वास्तविक तपस्या का उद्देश्य नहीं है।
विकल्प ख (सही): वक्ता न्याय शास्त्र के आधार पर अग्नि के चार प्रकार बतलाते हैं—भौमज, अब्ज, उदरज और आकरज। इसके साथ ही, 'तपश्चास्मि तपस्विषु' की व्याख्या में स्पष्ट करते हैं कि हठपूर्वक शरीर को कष्ट देना सच्ची तपस्या नहीं है, बल्कि जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल द्वंद्वों में सम रहकर सहिष्णु बनना और मन को स्थिर रखना ही वास्तविक तपस्या है।
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