भ. गी. 8.12-13
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
अनुवाद
इन्द्रियों के समस्त द्वारों को नियंत्रित करके, मन को हृदय में स्थिर कर उसे समस्त बाह्य विषयों से निरुद्ध करके, प्राण को सिर के शिखर तक ले जाकर, आत्मा पर केंद्रित योग-धारणा में स्थित होकर, “ॐ” इस एक अक्षर का, जो शब्दरूप ब्रह्म है, उच्चारण करते हुए, और मेरा निरंतर स्मरण करते हुए, जो इस प्रकार शरीर का त्याग करता है, वह परम गन्तव्य को प्राप्त करता है।