तारक-ब्रह्मयोग
अध्याय ७ के अन्त में श्रीकृष्ण ने ब्रह्मन् (परम तत्त्व), अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, और अधियज्ञ जैसे शब्दों का परिचय दिया । अर्जुन, इन शब्दों के अर्थ के विषय में स्पष्ट न होने के कारण, अध्याय ८ के प्रारम्भ में उनके सन्दर्भ में आठ प्रश्न करता है । इसके अतिरिक्त वह यह भी पूछता है कि " मृत्यु के समय संयमी पुरुष द्वारा आप कैसे जाने जाते हैं ?" श्रीकृष्ण इन सभी शब्दों की परिभाषा करते हैं एवं विस्तार से अर्जुन के आठ प्रश्नों का उत्तर देते हैं ।
इस अध्याय में अठ्ठाईस श्लोक हैं । पहले दो श्लोक अर्जुन के द्वारा पूछे गए प्रश्न हैं, तथा शेष श्लोक श्रीकृष्ण के उत्तर हैं । श्रीकृष्ण दो श्लोकों (३-४) में छह शब्दों को परिभाषित करते हैं: "परम अक्षर तत्त्व ब्रह्मन् है, स्वभाव ही अध्यात्म है । जिसमें दो शब्द हैं, - स्व – स्वयं, भाव - अस्तित्व की स्थिति और मनुष्यादि का उद्भव विसर्ग है, [जैसे कि देवताओं के लिए द्रव्यत्याग (यज्ञ) करना] जो सर्व भूतप्राणी के जन्म व विकास को बनाए रखते हैं, उन्हें कर्म कहा जाता है । नाशवान वस्तुओं का निरन्तर क्षय होता है उन्हें अधिभूत कहते हैं, आदिपुरुष अधिदेवता के रूप में जाने जाते हैं । “मैं स्वयं इस भूतप्राणी के देह में अधियज्ञ बनकर सर्व कर्म के प्रेरक व फलदाता के रूप में स्थित हूँ”।
अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि किसी का भविष्य में होने वाला जन्म, मृत्यु के समय उस के चिन्तन पर निर्भर करता है । वे देहत्याग की योग विधि का वर्णन करते हैं कि जो ॐ का जप करते हुए श्रीकृष्ण का स्मरण करता है, उस योगी को परम धाम (५-१४) प्राप्त होता है । ऐसा योगी पुनर्जन्म नहीं लेता (१५-१६) । श्रीकृष्ण सृष्टि और विनाश के चक्र (१७-१९) का विस्तृत वर्णन करते हैं और कहते हैं कि उन का धाम शाश्वत (२०-२१) है । यह धाम मात्र भक्ति योग से ही प्राप्त होता है (२२) ।
ऐसे दो योगिक मार्ग हैं, जिनका अनुसरण एक योगी देहत्याग के समय कर सकता है: प्रकाश का मार्ग और अन्धकार का मार्ग । (२४-२५) । जो प्रकाश-मार्ग के समय देहत्याग करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता, परन्तु जो अन्धकार-मार्ग के समय देहत्याग करता है वह स्वर्गीय सुख को भोगने के पश्चात् पुनः भूलोक में जन्म लेता है (२६) । इन दोनों मार्ग का ज्ञाता, कभी भी भ्रमित न होकर परम गन्तव्य स्थान (२७-२८) को प्राप्त करता है ।
सभी श्लोक
- श्लोक 1-2अर्जुन ने पूछा: हे पुरुषश्रेष्ठ! ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है, और फल उत्पन्न करने वाला कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहते हैं, और अधिदैव का क्या अर्थ है? हे मधुसूदन! अधियज्ञ कौन है, और वह इस शरीर में कैसे स्थित है? मृत्यु के समय संयत-मन वालों द्वारा आपको कैसे जानना चाहिए?
- श्लोक 3श्री भगवान ने कहा: परम अक्षर तत्त्व ब्रह्म है, अध्यात्म का अर्थ है स्वयं (स्व) की भावावस्था। और त्यागात्मक क्रियाएँ (विसर्ग, जैसे देवताओं के लिए यज्ञ में द्रव्य-त्याग), जो जीवों की उत्पत्ति और उनके विकास को बनाए रखती हैं, उन्हें कर्म कहा जाता है।
- श्लोक 4हे देहधारियों में श्रेष्ठ! नश्वर अस्तित्व [अर्थात् ऐसे पदार्थों का अस्तित्व जो नाशवान हैं] को अधिभूत कहा जाता है; पुरुष को अधिदैव (अर्थात् विराट् पुरूष) के रूप में जाना जाता है; और मैं स्वयं इस शरीर में स्थित अधियज्ञ, अर्थात् समस्त कर्मों का प्रेरक और उनके फलों का दाता हूँ।
- श्लोक 5और जो मृत्यु के समय केवल मेरा ही स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मेरे भाव को प्राप्त करता है । इस में कोई सन्देह नहीं है ।
- श्लोक 6हे कुन्तीपुत्र! मृत्यु के समय शरीर का त्याग करते हुए जो जिस वस्तु का स्मरण करता है, वह सदा उसी के विचारों में तन्मय रहते हुए उसी को ही प्राप्त करता है।
- श्लोक 7अतः प्रत्येक क्षण मुझे स्मरण करो और युद्ध करो। मन और बुद्धि को मुझमें समर्पित करके तुम निःसंदेह मुझे ही प्राप्त करोगे।
- श्लोक 8हे अर्जुन! अचल मन से ध्यान के अभ्यास में निरत होकर परम दिव्य पुरुष के चिन्तन में सदा स्थित रहते हुए, वह उसी को प्राप्त करता है।
- श्लोक 9-10मृत्यु के समय जो पुरुष, भक्ति से युक्त होकर, योगबल से प्राण को आज्ञा-चक्र में भली-भाँति स्थापित करके, अचल मन से सदा उस पुरुष का ध्यान करता है, जो सर्वज्ञ, अनादि, आदि-गुरु, अणु* से भी सूक्ष्म, सबका धारक, अचिन्त्य-रूप वाला, सूर्य के समान प्रकाशमान और अज्ञान से परे है, वह उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त करता है।
- श्लोक 11मैं तुम्हें संक्षेप में उस परम गन्तव्य के विषय में बताऊँगा, जिसे वेदों के ज्ञाता अक्षर ब्रह्म कहते हैं, जिसमें समस्त कामनाओं से रहित साधक प्रवेश करते हैं, और जिसकी इच्छा करके छात्र ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं।
- श्लोक 12-13इन्द्रियों के समस्त द्वारों को नियंत्रित करके, मन को हृदय में स्थिर कर उसे समस्त बाह्य विषयों से निरुद्ध करके, प्राण को सिर के शिखर तक ले जाकर, आत्मा पर केंद्रित योग-धारणा में स्थित होकर, “ॐ” इस एक अक्षर का, जो शब्दरूप ब्रह्म है, उच्चारण करते हुए, और मेरा निरंतर स्मरण करते हुए, जो इस प्रकार शरीर का त्याग करता है, वह परम गन्तव्य को प्राप्त करता है।
- श्लोक 14हे अर्जुन! अनन्य-चित्त होकर जो पुरुष नियत रूप से मेरा निरंतर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सहज ही प्राप्त हूँ।
- श्लोक 15मेरे पास पहुँचकर महात्मा उस अनित्य जन्म को फिर नहीं प्राप्त करते, जो दुःख का निवास है, क्योंकि वे परम सिद्धि को पा चुके हैं।
- श्लोक 16हे अर्जुन ! ब्रह्मा* के लोक तक के सभी लोक ऐसे स्थान हैं, जहाँ से निवासियों को पुनः [पृथ्वी पर] लौटना पड़ता है; किन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझे प्राप्त करने पर पुनर्जन्म नहीं होता।
- श्लोक 17जो यह जानते हैं कि ब्रह्मा का एक दिन चार युगों के एक सहस्र* चक्रों तक रहता है, और उनकी रात्रि भी उतनी ही अवधि तक रहती है, वे ही दिन और रात्रि के वास्तविक ज्ञाता हैं।
- श्लोक 18ब्रह्मा के दिन के आरम्भ में समस्त प्रकट जीव अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं, और उनकी रात्रि के आगमन पर वे पुनः उसी अव्यक्त की संज्ञा रखने वाले में लीन हो जाते हैं।
- श्लोक 19हे पार्थ! वही समस्त जीवसमुदाय, बार-बार जन्म लेकर, [ब्रह्मा की] रात्रि के आगमन पर अपने अव्यक्त कारण में लीन हो जाता है, और [उनके] दिन के आगमन पर पूर्वकर्म के प्रभाव से पुनः जन्म लेता है।
- श्लोक 20किन्तु उस अव्यक्त से परे एक अन्य अस्तित्व भी है [परम पुरुष], जो अव्यक्त तथा अनादि-अनन्त है। समस्त प्राणियों के नष्ट होने पर भी उसका विनाश नहीं होता।
- श्लोक 21[उस] अव्यक्त को “अक्षर” कहा गया है और उसे परम गन्तव्य कहा गया है, जिसे प्राप्त करने पर मनुष्य [इस मृत्युलोक में] लौटकर नहीं आते हैं। वही [अव्यक्त] मेरा परम स्वरूप है।
- श्लोक 22हे पार्थ! वह परम पुरुष, जिसमें समस्त जीव स्थित हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
- श्लोक 23हे भरतश्रेष्ठ! मैं उस समय का वर्णन करूँगा, जिस समय में योगी शरीर का त्याग करने पर या तो लौटकर आते हैं अथवा नहीं लौटते [भौतिक जगत् में]।
- श्लोक 24ब्रह्म के वेत्ता, अग्नि, प्रकाश, दिन, शुक्ल पक्ष, तथा सूर्य के उत्तरायण के छह महीनों में इस संसार से प्रस्थान करते हुए [अर्थात् इन विभिन्न कालगत प्रभावों के अधिष्ठाता देवताओं द्वारा शासित मार्ग का अनुसरण करके] ब्रह्म को प्राप्त करते हैं।
- श्लोक 25धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष, तथा सूर्य के दक्षिणायन के छह महीनों में प्रस्थान करने वाला योगी [अर्थात् इन देवताओं द्वारा शासित मार्ग का अनुसरण करके] चन्द्रलोक के प्रकाश को प्राप्त करता है और तत्पश्चात् [इस पृथ्वीलोक में] लौटकर आता है।
- श्लोक 26जगत् के ये दो मार्ग, शुक्ल और कृष्ण, नित्य माने जाते हैं। इनमें से एक के द्वारा जाने पर मनुष्य लौटकर नहीं आता, जबकि दूसरे के द्वारा जाने पर वह पुनः लौटकर आता है।
- श्लोक 27हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानकर योगी कभी मोहित नहीं होता। इसलिए, हे अर्जुन! तुम हर समय योग से युक्त रहो।
- श्लोक 28वेदों के अध्ययन, यज्ञ के अनुष्ठान, तप के आचरण, तथा दान के कार्यों के सम्बन्ध में [शास्त्रों में] जो भी पुण्यफल बताए गए हैं, इस तत्त्व को [अर्थात् आठ विषयों के ज्ञान को] जानकर योगी उन सबका अतिक्रमण कर जाता है। इस प्रकार वह मूल परम स्थान को प्राप्त करता है।