भ. गी. 9.8

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥

अनुवाद

अपनी प्रकृति के माध्यम से कार्य करते हुए, मैं बार-बार उनके पूर्व अर्जित स्वभावों के अनुसार [कर्म आदि के] अधीन इस सम्पूर्ण जीवसमुदाय को प्रकट करता हूँ।

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