प्रस्तावना
भगवद् गीता एक प्राचीन ग्रन्थ है जो प्रायः ५२०० वर्ष पूर्व, भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा उनके मित्र अर्जुन को कहा गया था । वे दोनों उस समाज से सम्बन्धित थे, जो वर्णाश्रम-धर्म, वेदशास्त्र एवं स्मृतियों पर निर्धारित सामाजिक कर्तव्यों द्वारा आधारित था । अतः, यहाँ प्रयुक्त कुछ शब्दावली आधुनिक मानव को पुरातन और अपरिचित लग सकती है । तथापि, दिए गए ज्ञान और निर्देश सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक होने के कारण आज भी अत्यन्त उपादेय और प्रासंगिक हैं ।
भगवद् गीता एक स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं है । अपितु यह महाभारत का एक छोटा सा अंश है जो कि विश्व का सबसे महान महाकाव्य है । ऋषि वेद व्यास द्वारा रचित यह महाभारत मुख्य रूप से उन लोगों के लिए था जिन्हें वेदाध्ययन के लिए अयोग्य माना जाता था । पूर्व समय में वेदों का अध्ययन करने के लिए विद्यार्थी का वर्णाश्रम के किसी एक वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य) से सम्बन्धित होना अनिवार्य था । जो ज्ञान वेदों में मिलता है वही आवश्यक ज्ञान महाभारत में भी है, परन्तु विस्तृत कथाओं के माध्यम से सरलीकृत तरीक़े से दिया गया है । यह भारत के प्रसिद्ध राजवंशों के इतिहास का वर्णन करता है । दो प्रमुख राजवंश थे - सूर्य तथा चन्द्र वंश । भगवद् गीता में, चन्द्र वंश में प्रकट हुए चचेरे भाइयों के दो समूहों, कौरवों और पाण्डवों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है ।
कौरववंशी धृतराष्ट्र जन्म से अन्धा था तथा उसके एक सौ पुत्र थे । दुर्योधन उसका ज्येष्ठ पुत्र था । पाण्डव, पाण्डु के पाञ्च पुत्र थे, जिनकी मृत्यु बहुत कम उम्र में ही हो गई थी । धृतराष्ट्र और पाण्डु भाई थे । ज्येष्ठ धृतराष्ट्र के अन्धे होने के कारण, पाण्डु कौरव साम्राज्य की राजधानी हस्तिनापुर के राजा बने, परन्तु उनकी असामयिक मृत्यु हो गई इसलिए अन्धे भाई ने सिंहासन ग्रहण किया । दुर्योधन नहीं चाहता था कि उसका चचेरा भाई युधिष्ठिर, ज्येष्ठ पाण्डव, जो राज्य का उत्तराधिकारी था, राजा बने । उसने विभिन्न तरीक़ों से पाण्डवों को मारने की कोशिश की परन्तु सभी पाण्डव श्रीकृष्ण की कृपा से सुरक्षित बचे रहे ।
बाद में, जब युधिष्ठिर युवा हुए तब धृतराष्ट्र ने उन्हें राज्य का एक छोटा सा हिस्सा दे दिया, और इस प्रकार, युधिष्ठिर राजा बने । युधिष्ठिर एक नैतिक और न्याय-परायण राजा थे अतः बहुत प्रसिद्ध और समृद्धशाली हुए । उनके आज्ञाकारी भाई उनसे अत्यधिक स्नेह करते थे और प्रजा भी उनका बहुत सम्मान करती थी । जब दुर्योधन ने इस ऐश्वर्य और लोकप्रियता को देखा, तो वह युधिष्ठिर से अत्यधिक ईर्ष्या करने लगा । उसने अपने पिता धृतराष्ट्र को मना लिया कि युधिष्ठिर को कौरवों के साथ जुआ खेलने हेतु आमन्त्रित करें । अपने चाचा के प्रति अति आदरपूर्ण और आज्ञाकारी होने के कारण, युधिष्ठिर ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। दुर्योधन ने युधिष्ठिर को धोखा देने तथा उनका राज्य जीतने के लिए अपने मामा शकुनि की सहायता ली, जो कि जुए में प्रवीण था। छल से जुए में जीतने के बाद दुर्योधन, इस शर्त पर युधिष्ठिर और उनके भाईयों को राज्य वापस लौटाने के लिए सहमत हुआ कि वे बारह वर्ष तक जंगल में और एक वर्ष गुप्तवास करें ।
दुर्योधन की शर्त को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद पाण्डवों ने अपने वचन के अनुसार दुर्योधन से अपने राज्य की मांग की, लेकिन दुर्योधन ने एक इंच जमीन भी वापस करने से अस्वीकार कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने चचेरे भाइयों के मध्य समझौता करने की कोशिश की, परन्तु दुर्योधन अपनी बात पर अड़ा रहा । उसने अहङ्कारयुक्त होकर यह घोषणा की, कि पाण्डव उसे युद्ध में हराकर ही अपना हिस्सा ले सकते हैं । इस प्रकार पाण्डवों का जंगल में पुनः वास अस्वीकार करने पर युद्ध निश्चित हुआ। क्षत्रिय एवं योद्धा होने के नाते पाण्डवों ने न्याय के लिए युद्ध लड़ना अपना कर्त्तव्य माना। उन्होंने अपनी माँ कुन्ती की अनुमति से यह चुनौती स्वीकार की । तब कौरव एवं पाण्डव दोनों ही युद्ध के लिए तैयार हुए।
युद्ध आरम्भ होने से पूर्व, ऋषि व्यास ने हस्तिनापुर के अन्धे राजा धृतराष्ट्र को, जिनके प्रति उनका अति स्नेह था, एक वरदान देना चाहा। उन्होंने राजा से कहा, "मैं देखता हूँ कि क्षत्रियों का युद्ध और नरसंहार इस युद्ध में अपरिहार्य है। यदि आप युद्ध की गतिविधियों को देखना चाहते हैं, तो मैं आपको दिव्य दृष्टि प्रदान कर सकता हूँ ताकि आप सिंहासन पर बैठे हुए युद्ध देख सकें"। धृतराष्ट्र ने उत्तर दिया, "मैं जीवनभर अन्धा रहा हूँ । मैं अब अपने ही सभी परिजनों को युद्ध में मरते हुए नहीं देखना चाहता हूँ । परन्तु मैं युद्ध का विवरण सुनना चाहूँगा"। ऋषि व्यास ने उत्तर दिया, "मैं आपके सचिव व सलाहकार सञ्जय को दिव्य दृष्टि प्रदान करूँगा, जिससे वह न केवल युद्धभूमि की घटनाओं को ही बल्कि योद्धाओं के विचारों को भी जान, सुन और देख सकेगा। वह आपको विशद वर्णन करेगा ।” तब ऋषि व्यास ने सञ्जय को दिव्य दृष्टि प्रदान की।
नियत समय पर कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर युद्ध आरम्भ हुआ । सञ्जय वहाँ उपस्थित थे । दसवेँ दिन, कौरवों के सेनापति और कौरवों व पाण्डवों के पितामह भीष्म, (अर्जुन के) बाणों से बुरी तरह घायल होकर जमीन पर गिर गए । तब धृतराष्ट्र को समाचार देने के लिए, सञ्जय युद्धभूमि कुरुक्षेत्र से राजधानी हस्तिनापुर आए । यह समाचार सुनकर धृतराष्ट्र बहुत दुःखी हुए और रोने लगे । इस के बाद उन्होंने सञ्जय से युद्ध के हर एक विवरण को बताने का अनुरोध किया । यह संवाद, महाभारत के भीष्मपर्व के तेरहवें अध्याय से शुरू होकर चौबीसवें अध्याय तक जारी रहता है । पच्चीसवें अध्याय की शुरुआत में, धृतराष्ट्र सञ्जय से युद्ध का प्रारम्भ से ही वर्णन करने के लिए अनुरोध करते हैं (यहाँ गीता आरम्भ होती है) । धृतराष्ट्र की यह जिज्ञासा गीता का प्रारम्भिक श्लोक है ।
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व्याख्यान में वर्णित 'त्रिपुटी' (शब्द, अर्थ और ज्ञान) के सिद्धांत के अनुसार, किसी 'शब्द' (Word) के वास्तविक 'अर्थ' और 'ज्ञान' की सही व्याख्या क्या है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि किसी शब्द के बदले दूसरा शब्द बोलना (जैसे 'जल' के स्थान पर 'पानी') केवल एक और शब्द है, वास्तविक 'अर्थ' नहीं। 'अर्थ' वह प्रत्यक्ष वस्तु है जिसे छुआ, पिया या अनुभव किया जा सकता है (जैसे पात्र में रखा जल)। 'ज्ञान' उस शब्द और उस प्रत्यक्ष वस्तु के बीच के संबंध को जोड़ने की प्रक्रिया है।
विकल्प ख (गलत): शब्द और अर्थ दो अलग-अलग घटक हैं (शब्द केवल कानों से सुना जाता है, जबकि अर्थ/वस्तु का स्पर्श या उपभोग होता है)। 'अर्थ' केवल पर्यायवाची शब्द नहीं है और न ही केवल शब्द को याद कर लेना 'ज्ञान' कहलाता है।
वैदिक अध्ययन पद्धति (अनुबंध चतुष्टय) के अनुसार, भगवद्गीता की 'भूमिका' का मुख्य कार्य क्या है और इसका वास्तविक 'अधिकारी' कौन है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता के अनुसार 'भूमिका' शब्द 'भूमि' से बना है, जो मंदिर या ऊंचे स्थान तक पहुंचने वाली सीढ़ियों की तरह ग्रंथ के ज्ञान में प्रवेश कराती है। गीता किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं है; निष्कपट जिज्ञासा (जानने की तीव्र इच्छा) और श्रद्धा रखने वाला कोई भी मानव इसका योग्य अधिकारी है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि गीता केवल किसी एक धर्म या संप्रदाय के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए है। बिना श्रद्धा और जिज्ञासा के, केवल किसी संप्रदाय विशेष से होना या औपचारिक डिग्री होना किसी को इसका अधिकारी नहीं बनाता।
व्याख्यान में श्रुति (वेद) और स्मृति ग्रंथों के संबंधों को जिस उदाहरण से समझाया गया है, उसके अनुसार इनका सही कार्य-विभाजन क्या है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता के अनुसार वेद नित्य, अपौरुषेय और सर्वोच्च प्रमाण हैं। जैसे विज्ञान में मूल सिद्धांत होते हैं और प्रौद्योगिकी उनका व्यावहारिक प्रयोग सिखाती है, वैसे ही ऋषियों ने वेदों के ज्ञान का साक्षात्कार करके स्मृतियों की रचना की ताकि समाज में उस ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग किया जा सके।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि स्मृतियों का मूल आधार वेद ही हैं। स्मृतियाँ वेदों से अलग या स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि वेदों के सिद्धांतों को स्मरण करके ही समाज के आचरण हेतु रची गई हैं।
भारतीय दर्शन परंपरा के अनुसार 'आस्तिक' की वास्तविक परिभाषा क्या है, और सभी दर्शनों का मूलभूत बीजरूप उद्देश्य क्या माना गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान में 'वेद निंदकस्तु नास्तिकः' का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि जो वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करता है वही आस्तिक है। इसके साथ ही, सभी दर्शनों का मूल बीज 'सुखम मे स्यात्, दुखम मा भूत्' (मैं सुखी रहूँ, दुखी न रहूँ) के आधार पर मनुष्य को परम तत्त्व का दर्शन और अनुभव कराना है।
विकल्प ख (गलत): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि यदि कोई व्यक्ति ईश्वर में विश्वास का दावा करता है लेकिन ईश्वर के वाणी-रूपी वेदों को नहीं मानता, तो वह आस्तिक नहीं है। इसके अलावा, भारतीय दर्शन केवल बौद्धिक तर्क नहीं है, बल्कि उसमें जीवन को उन्नत बनाने का व्यावहारिक मार्ग निहित है।
व्याख्यान के अनुसार, शास्त्रों में प्रयुक्त 'अर्थवाद' (रोचक वाक्य) का मूल उद्देश्य क्या है, और इस प्रकार के वाक्यों को समझते समय पाठक को क्या सावधानी रखनी चाहिए?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि जिस प्रकार किसी विज्ञापन का उद्देश्य व्यक्ति में रुचि उत्पन्न करना होता है, उसी प्रकार अर्थवाद या रोचक वाक्य प्रशंसा करके मनुष्य में शुभ कर्मों के प्रति रुचि पैदा करते हैं। इन्हें सीधे यथार्थ नियम मानने के बजाय इनके पीछे छिपे मूल उद्देश्य और तात्पर्य को समझना चाहिए।
विकल्प ख (गलत): अर्थवाद वाक्य काल्पनिक नहीं हैं और न ही ये सीधे यथार्थ नियम हैं। इन्हें बिना समझे शब्दशः यथार्थ मान लेना ही पाठक के भ्रमित होने और शास्त्र पर शंका करने का मुख्य कारण बनता है।
व्याख्यान के अनुसार, मनुष्य के जीवन में निरंतर आने वाले दुःखों का मूल कारण क्या है, और भगवद्गीता इस समस्या का समाधान किस प्रकार करती है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि दुःख का मूल कारण हमारा अपना अज्ञान है। अज्ञान के कारण गलत ज्ञान से गलत इच्छा, गलत निर्णय और गलत कर्म की श्रृंखला बनती है जो दुःख लाती है। गीता सही ज्ञान देकर इस श्रृंखला को सही ज्ञान, सही निर्णय और सही कर्म में बदल देती है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार दुःख का मूल कारण बाहरी लोग नहीं बल्कि हमारा अपना अज्ञान है। साथ ही, गीता कर्मों का त्याग करने के बजाय सही ज्ञान के आधार पर सही निर्णय लेकर जीवन-रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देती है।
व्याख्यान में वर्णित 'प्रकृति', 'विकृति' और 'संस्कृति' के सूक्ष्म अंतर तथा 'संस्कृति' के तीन मुख्य उद्देश्यों के आधार पर मनुष्य और पशु के आचरण का सही दार्शनिक विश्लेषण क्या है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): पशुओं में संस्कृति या विकृति का चयन करने की सुविधा नहीं होती। इसके अतिरिक्त, व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि केवल नाच-गाना या मनोरंजन 'संस्कृति' नहीं है, बल्कि अपने आप को शुद्ध और उन्नत बनाना ही वास्तविक संस्कृति है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि पशु-पक्षी अपनी प्रकृति से बंधे हैं और उसके विरुद्ध कार्य नहीं करते। केवल मनुष्य के पास यह सुविधा है कि वह सही ज्ञान के बिना 'विकृति' (जिसका फल दुःख है) में चला जाए, या सही ज्ञान द्वारा मलों को दूर करके, गुणों का आधान करके और कमियों को पूरा करके अपने जीवन को 'संस्कृत' बना ले।
भगवद्गीता में वर्णित पाँच मुख्य विषयों (ईश्वर, जीव, काल, प्रकृति और कर्म) के दार्शनिक विश्लेषण के अनुसार, 'जीव' और 'काल' के स्वरूप में क्या मुख्य समानता और अंतर है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि जीव और काल नश्वर नहीं बल्कि अनादि और अनंत (नित्य) हैं। इसके अलावा काल चेतन नहीं बल्कि अचेतन (जड़) पदार्थ है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार ईश्वर, जीव और काल तीनों नित्य हैं। परंतु मुख्य अंतर यह है कि जीव चेतन है (उसमें चेतना और अनुभूति है) और ईश्वर का छोटा सा चित्-कण है, जबकि काल अचेतन (जड़) तत्त्व है जो नित्य होते हुए भी स्वयं चेतन नहीं है।
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