अध्यायों का संक्षिप्त विवरण
भगवद् गीता में अठारह अध्याय हैं, तथा प्रत्येक अध्याय को एक प्रकार के योग के रूप में नामाङ्कित किया गया है । योग शब्द के विभिन्न अर्थ हैं । गीता में इसका उपयोग, मुख्य रूप से लक्ष्य प्राप्ति तथा उससे जुड़ने के लिए विविध साधनों के अर्थ में किया गया है । अतः, योग शब्द का अनुवाद "पथ" या मार्ग के रूप में भी किया जा सकता है, जैसा कि यहाँ विशेष रूप से अध्यायों के शीर्षक में किया गया है । मुख्य रूप से योग तीन प्रकार के हैं, कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग । जब हम अपने लक्ष्य से जुड़ने या उस तक पहुँचने के लिए, कर्म या निष्काम कर्म का उपयोग करते हैं, तो इसे कर्मयोग कहा जाता है । इसी प्रकार, जब हम ज्ञानवृद्धि या ब्रह्म-साक्षात्कार की अपरोक्ष अनुभूति के लिए साधना करते हैं, तो इसे ज्ञानयोग कहा जाता है । जब भक्ति को प्रभु का प्रेम प्राप्त करने के साधन के रूप में अपनाया जाता है, तो इसे भक्ति योग कहते हैं । भक्ति न केवल साधन है, अपितु साध्य भी है ।
गीता के अठारह अध्यायों का विषय-विवरण छह -छह अध्याय के तीन विभागों में किया है । प्रथम विभाग मुख्य रूप से कर्मयोग पर, द्वितीय भक्तियोग पर तथा अन्तिम विभाग ज्ञानयोग पर केन्द्रित है । परन्तु इन तीनों विषयों के कुछ विवरण सभी अध्यायों में पाए जाते हैं ।
पहले छह अध्याय (१ – ६) कर्मयोग की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करते हैं :
पहला अध्याय परिचयात्मक है तथा इसमें किसी विशिष्ट योग का विवरण नहीं है । इसका शीर्षक विषाद योग है, क्योंकि यह अध्याय कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर अर्जुन द्वारा सेनाओं का सर्वेक्षण करने के बाद, विषादग्रस्त अर्जुन की मानसिक स्थिति का विशद वर्णन करता है । इसे केवल तभी एक योग के रूप में माना जा सकता है, जब यह विषादयोग आत्मनिरीक्षण की ओर प्रेरित करता है, और आध्यात्मिक जिज्ञासा का आधार बन जाता है । निराशा की स्थिति में व्यक्ति की भौतिकवादी गतिविधियों में भोग-विलास की भावना शिथिल हो जाती है और इस प्रकार ईश्वर पर विचार-विमर्श करने की एक विशिष्ट सम्भावना बन जाती है ।
दूसरे अध्याय में, मुख्य विषय साङ्ख्ययोग है, जो एक प्रकार का विश्लेषणात्मक ज्ञानयोग है । यहाँ ज्ञानयोग की शिक्षा, कर्मयोग के निर्देशों के साथ मिश्रित है ।
तीसरा अध्याय, मुख्य रूप से कर्मयोग से सम्बन्धित है ।
चौथा अध्याय, कर्मयोग का वर्णन करता है, जो ज्ञानयोग में परिणत होता है ।
पाञ्चवे अध्याय में बताया गया है कि किस प्रकार कर्मयोग और ज्ञानयोग का अन्तिम परिणाम एक ही है तथा बुद्धिमान व्यक्ति इन दोंनो मार्ग के मध्य कोई भेद नहीं देखता है ।
छठा अध्याय मुख्य रूप से ध्यान योग का वर्णन करता है, जिसे राजयोग के नाम से भी जाना जाता है, हालाँकि, आरम्भ में यहाँ कर्मयोग का भी कुछ वर्णन मिलता है । ध्यानयोग ध्यान की वह प्रक्रिया है, जो ज्ञानयोग में समाहित की जा सकती है ।
भगवद्गीता में ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों का भक्तियोग के साथ मिश्रित रूप से वर्णन किया गया है । यह गीता की एक विशेषता है कि यह प्रत्येक योग को भक्तियोग में समाहित करके वर्णन करती है । इस प्रकार, गीता के प्रथम छह अध्याय कर्मयोग पर अधिक ध्यान केन्द्रित करते हैं ।
दूसरे छह अध्याय (७-१२) भक्ति योग की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करते हैं ।
सातवें अध्याय में, श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे ब्रह्माण्ड का स्रोत हैं और सब कुछ उनसे ही प्रकट होता है । जो उनके प्रति समर्पण करते हैं वे संसार के बन्धनों को पार कर सकते हैं । परिणामतः, वास्तव में जो बुद्धिमान व्यक्ति है, वह यह जानकर उनकी शरण ग्रहण करता है कि सब कुछ श्रीकृष्ण भगवान की अभिव्यक्ति है ।
आठवें अध्याय में, श्रीकृष्ण, अपनी प्रतिनिधि ध्वनि ॐ के माध्यम से मुक्ति प्राप्त करने की प्रक्रिया को बताते हैं । वे शुक्ल और कृष्ण गति की भी बात करते हैं जो क्रमशः अनावृत्ति और आवृत्ति मार्ग की ओर ले जाता है । प्रकाश का मार्ग (शुक्ल गति) जो कि मुक्ति में परिणत होता है तथा अन्धकार का मार्ग (कृष्ण गति) जो कि संसार में पुनर्जन्म लेने में परिणत होता है ।
नौवें अध्याय में वे ब्रह्माण्ड के सर्जन के विषय में बताते हैं, जिसे उन्होंने अध्याय ७ में आरम्भ किया था । वे भक्ति मार्ग के आचरण की संस्तुति के साथ अध्याय का समापन करते हैं ।
दसवें अध्याय में, उन्होंने ब्रह्माण्ड में प्रकट अपनी अभूतपूर्व विभूतियों पर ध्यान की प्रक्रिया का वर्णन किया हैं ।
ग्यारहवें अध्याय में, श्रीकृष्ण द्वारा, अर्जुन को अपने विश्वरूप के रहस्योद्घाटन का वर्णन है ।
बारहवाँ अध्याय अर्जुन के प्रश्न “ध्यान का कौन सा रूप श्रेष्ठ है – निर्विशेष ब्रह्म (अव्यक्त अक्षर) या सविशेष ब्रह्म (स्वयं भगवान)”, के उत्तर में कहा गया है – इसके उत्तर के प्रारम्भ से श्रीकृष्ण भक्ति की प्रक्रिया की व्याख्या करते हैं, एवं अपने भक्तों के गुणों का वर्णन करते हैं ।
अन्तिम समूह के छह अध्यायों में, मुख्य रूप से ज्ञानयोग का वर्णन किया गया है ।
तेरहवाँ अध्याय सूक्ष्म और स्थूल देह को एक क्षेत्र के रूप में तथा चेतना को क्षेत्रज्ञ (देह के ज्ञाता) के रूप में परिभाषित करता है ।श्रीकृष्ण यह भी समझाते हैं कि वे सभी क्षेत्र (देह) के क्षेत्रज्ञ हैं तथा इस भौतिक जगत में सभी उत्पन्न वस्तु जड़ और चेतन का संयोजन है ।
चौदहवें अध्याय में, मूल प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस् व तमस्) की व्याख्या तथा लक्षण का वर्णन किया गया हैं ।
पंद्रहवे अध्याय में, पुरुषोत्तम भगवान तथा उनकी सर्व व्यापकता का वर्णन किया है ।
सोलहवें अध्याय में अपने स्वभाव से बद्ध दैवी तथा आसुरिक व्यक्तियों के गुणों का वर्णन किया गया ।
सत्रहवें अध्याय में प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार श्रद्धा, भोजन, यज्ञ, दान और तप के विभाजनों का वर्णन किया गया है ।
अन्तिम अठ्ठारवें अध्याय में, उनकी शिक्षाओं का सारांश तथा अन्तिम निष्कर्ष का वर्णन किया गया है । यद्यपि यह अध्याय तीनों योगों को सन्दर्भित करता है, किन्तु यह भक्ति योग के पक्ष में एक विशेष आग्रह के साथ समाप्त होता है ।