भ. गी. 1.15
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥
अनुवाद
श्रीकृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया, अर्जुन ने अपना देवदत्त शङ्ख बजाया, और अत्यन्त भयानक कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक अपना भव्य शङ्ख बजाया ।
श्रीकृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया, अर्जुन ने अपना देवदत्त शङ्ख बजाया, और अत्यन्त भयानक कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक अपना भव्य शङ्ख बजाया ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि श्वेत घोड़े केवल बाहरी सुंदरता के लिए नहीं हैं बल्कि आंतरिक चित्त-शुद्धि और शुद्ध इंद्रियों के प्रतीक हैं। इसके अलावा, केवल शारीरिक बल से नहीं बल्कि बुद्धि और ज्ञान से ही जीवन-यात्रा में विजय मिलती है।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार शरीर रथ है, आत्मा रथी (यात्री) है, बुद्धि सारथी (चालक) है और इंद्रियाँ घोड़े हैं। श्वेत वर्ण शुद्धता का प्रतीक है जो यह दर्शाता है कि इंद्रियों का शुद्ध होना आवश्यक है। जब बुद्धि रूपी सारथी परमात्मा के ज्ञान से युक्त होकर शुद्ध इंद्रियों को नियंत्रित करती है, तभी मनुष्य कर्म-बंधन से मुक्त होकर अपने वास्तविक गंतव्य को प्राप्त करता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार उग्र प्रतिक्रिया देना स्वतंत्रता नहीं बल्कि अहंकार और मन के अधीन होने की निशानी है। सच्चा सामर्थ्य शांत और संयमित मन से सोच-विचार कर सही निर्णय (क्रिया) लेने में निहित है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि जब हम किसी के उकसाने पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं तो हमारा स्वयं पर नियंत्रण खत्म हो जाता है और हम दूसरों के मन के अधीन हो जाते हैं। भगवान कृष्ण ने भीष्म के शंख बजाने पर तुरंत कोई आवेशित प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि मर्यादा का पालन करते हुए संयमित मन से विवेकपूर्ण क्रिया की।
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