हे सम्राट ! तब आपके पुत्रों और समर्थकों को युद्ध के लिए तैयार देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुन, जिनके ध्वज पर हनुमान का चिह्न है, ने तीर चलाने की तैयारी करते हुए अपना धनुष उठाया और उस समय इन शब्दों में श्री कृष्ण को सम्बोधित किया ।
व्याख्यान के अनुसार, शंखनाद की भयानक ध्वनि ने केवल धृतराष्ट्र के पुत्रों और उनकी सेना के हृदय को ही 'विदीर्ण' (भयभीत) क्यों किया, जबकि पांडवों की सेना पर ऐसा कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि पांडवों की सेना केवल सात अक्षौहिणी थी जबकि कौरवों की सेना ग्यारह अक्षौहिणी थी (अर्थात कौरवों की सेना चालीस प्रतिशत अधिक बड़ी थी)। अतः संख्या बल के कारण नहीं, बल्कि अधर्म और पाप के आंतरिक भय के कारण कौरवों का हृदय विदीर्ण हुआ।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि अधर्म करने वाले व्यक्ति के हृदय में हमेशा एक अनजाना भय रहता है (जैसे महाबलशाली रावण भी चोरी करते समय डरा हुआ था)। शंख की ध्वनि तो दोनों पक्षों ने सुनी, किंतु कौरवों के अधार्मिक संस्कारों के कारण उस ध्वनि ने केवल उनके ही हृदय को विदीर्ण किया।
अर्जुन द्वारा भगवान श्री कृष्ण को 'अच्युत' कहकर अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में खड़ा करने की प्रार्थना का क्या गहरा आध्यात्मिक अर्थ है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि यह स्थिति आध्यात्मिक साधक की यात्रा का प्रतीक है। अपने रथ (शरीर) को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर निरीक्षण करने का तात्पर्य है निष्पक्ष होकर अपने दोषों, अवगुणों और संस्कारों को पहचानना। तथा जिनका कभी पतन नहीं होता, ऐसे अच्युत (भगवान) की शरण लेकर ही माया के विरुद्ध युद्ध जीता जा सकता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन कोई दर्शक या क्रीड़ा देखने वाला नहीं था, न ही वह कोई चापलूसी कर रहा था। वह बिना किसी राजनीति के निष्कपट भाव से अपने शत्रुओं और अपनी शक्तियों व सीमाओं को समझने हेतु निरीक्षण करना चाहता था।