भ. गी. 1.26-27a

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।

अनुवाद

इसके पश्चात् अर्जुन ने दोनों सेनाओं के मध्य में अपने चाचा-ताऊओं* को, दादाओं को, आचार्यों को, मामाओं को, भाईयों एवं चचेरे भाईयों को, पुत्रों एवं भतीजों को, पौत्रों एवं चचेरे पौत्रों को, मित्रों को, ससुरों तथा सुहृदों को भी वहां उपस्थित देखा ।

टिप्पणियाँ

* चूँकि कुरुक्षेत्र के युद्ध से बहुत पहले ही अर्जुन के पिता का देहांत हो चुका था, इसलिए यहाँ बहुवचन पितॄन्, अर्थात् “पिताओं”, से आशय पिता के भाइयों से है, जिन्हें भारतीय पारिवारिक संबंधों में जन्मदाता पिता के लगभग समकक्ष माना जाता है। श्लोक 1.33–34 में पितॄन् के अनुवाद पर भी यही मानदंड लागू होता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन के रथ को भीष्म और द्रोणाचार्य के ठीक सामने स्थापित करके "इन एकत्रित कौरवों को देखो" कहने का क्या सूक्ष्म और गहरा आध्यात्मिक उद्देश्य था?

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