भ. गी. 1.27b-28a
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
अनुवाद
कुन्तीपुत्र इन सब सम्बन्धियों को युद्धभूमि में अवस्थित देखकर अत्यन्त कृपा से आविष्ट हो गये और विषाद - भाव से ये वचन बोले ।
कुन्तीपुत्र इन सब सम्बन्धियों को युद्धभूमि में अवस्थित देखकर अत्यन्त कृपा से आविष्ट हो गये और विषाद - भाव से ये वचन बोले ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि भगवान का उद्देश्य अर्जुन में क्रोध या प्रतिशोध की भावना भड़काना नहीं था, बल्कि अर्जुन के अंतर्मन में छिपी आसक्ति और अज्ञान को प्रकट करके उसका स्थायी समाधान देना था।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान ने रथ को जान-बूझकर भीष्म और द्रोण के सामने खड़ा किया और कौरवों को देखने के लिए कहा ताकि अर्जुन के भीतर स्थित पारिवारिक और गुरु संबंधी सुप्त आसक्ति तथा संस्कार जागृत हो सकें। यही मोह और विषाद भगवद्गीता के महान उपदेश के प्रकटन का आधार बना।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन का हृदय जिस कृपा से भरा, वह वास्तव में ममत्व और आसक्ति ही थी। भौतिक जगत में हमारी पहचान संबंधों से जुड़ी होती है; जब अर्जुन ने उन सभी संबंधों के एक साथ विनाश की संभावना देखी, तो उसे अपने ही अस्तित्व का लोप महसूस हुआ, जो भयंकर विषाद का कारण बना।
विकल्प ख (गलत): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन की कृपा निष्काम या आसक्ति-रहित नहीं थी, बल्कि वह 'ममत्व' (यह मेरा है) पर आधारित सांसारिक आसक्ति ही थी। जब तक ममत्व रहता है, तब तक वास्तविक अहिंसा या पूर्ण आध्यात्मिक दया संभव नहीं होती।
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