भ. गी. 1.31
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
अनुवाद
हे केशव ! मैं अशुभ लक्षणों को भी देख रहा हूँ और युद्ध में अपने स्वजनों की हत्या करने में कोई श्रेय नहीं देख रहा हूँ।
हे केशव ! मैं अशुभ लक्षणों को भी देख रहा हूँ और युद्ध में अपने स्वजनों की हत्या करने में कोई श्रेय नहीं देख रहा हूँ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन कोई कायर योद्धा नहीं था और न ही वह युद्ध में हार-जीत या स्वयं की मृत्यु के भय से डर रहा था। उसका विषाद केवल अपने स्वजनों के प्रति उपजे ममत्व और उनके विनाश की सम्भावना से था।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन के विषाद का मूल कारण क्षत्रिय के रूप में पराजय का भय नहीं, बल्कि मोह जनित 'ममत्व' है। जब उसने अपने सभी सम्बंधियों को देखा, तो उसे यह भय हुआ कि युद्ध में उसके सभी सम्बंधी नष्ट हो जाएँगे, जिससे जीवन का सारा रस और सम्बंध समाप्त हो जाएँगे।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन की यह भावना निष्काम नहीं थी, बल्कि मोह पर आधारित थी। इसके साथ ही, अर्जुन स्वभाव से एक क्षत्रिय योद्धा था; इसलिए उसका यह विचार उसकी मूल प्रकृति के विपरीत एक क्षणिक मानसिक निर्बलता मात्र था, न कि वास्तविक संन्यास।
विकल्प ख (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन की अहिंसा वास्तविक आध्यात्मिक अहिंसा नहीं है। उसने विशेष रूप से 'स्वजन' (अपने लोग) शब्द का प्रयोग किया, जिसका तात्पर्य है कि उसकी दया केवल अपनों तक सीमित थी। यदि सामने उसके अपने सम्बंधी न होकर कोई अन्य लोग होते, तो वह उनसे निसंकोच युद्ध करता।
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