भ. गी. 1.30

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥

अनुवाद

मेरा गाण्डीव धनुष हाथ से गिर रहा है और मेरी त्वचा वास्तव में जल रही है । मैं ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा हूँ और मेरा मन भ्रमित हो रहा है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अपने सभी स्वजनों को उपस्थित देखकर अर्जुन के भीतर भयंकर विषाद और शारीरिक व्याकुलता उत्पन्न होने का वास्तविक मूल कारण क्या है?

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