भ. गी. 1.33-34

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥

अनुवाद

जिनके लिए हम साम्राज्य, भोग और सुख की आकाङ्क्षा रखते हैं – हमारे आचार्य, चाचा ताऊ, बेटे और भतीजे, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, बहनोई, और अन्य सम्बन्धी – वे तो अपने प्राण एवं धन दाँव पर लगाकर यहाँ युद्धभूमि पर अवस्थित हैं ।

वीडियो व्याख्याएँ देखें

अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान में भगवान श्री कृष्ण के 'मधुसूदन' नाम की जो पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि बताई गई है, उसके अनुसार मानव मन के वे दो कौन से मुख्य दोष हैं जिन्हें 'मधु' और 'कैटभ' असुरों का रूप माना गया है?

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।