येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥
अनुवाद
जिनके लिए हम साम्राज्य, भोग और सुख की आकाङ्क्षा रखते हैं – हमारे आचार्य, चाचा ताऊ, बेटे और भतीजे, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, बहनोई, और अन्य सम्बन्धी – वे तो अपने प्राण एवं धन दाँव पर लगाकर यहाँ युद्धभूमि पर अवस्थित हैं ।
व्याख्यान में भगवान श्री कृष्ण के 'मधुसूदन' नाम की जो पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि बताई गई है, उसके अनुसार मानव मन के वे दो कौन से मुख्य दोष हैं जिन्हें 'मधु' और 'कैटभ' असुरों का रूप माना गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'मधु' का अर्थ धन का लोभ और 'कैटभ' का अर्थ कायरता नहीं है, बल्कि ये दोनों हमारी स्वयं की प्रशंसा सुनने और दूसरों की निंदा सुनने की आंतरिक मानसिक प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि कान के दो मैल ही 'मधु' और 'कैटभ' असुर हैं। अपनी प्रशंसा सुनना मधु (शहद) की तरह मीठा लगता है और दूसरों की निंदा सुनना या उन्हें नीचा दिखाना कैटभ की भाँति अहंकार को पुष्ट करता है। इन दोनों मनोविकारों (असुरों) का विनाश केवल भगवान मधुसूदन ही कर सकते हैं।
शास्त्रों के अनुसार कौरवों द्वारा छहों प्रकार के 'आततायी' कर्म किए जाने के बावजूद, अर्जुन द्वारा युद्धभूमि में उन्हें मारने पर 'पाप लगेगा' कहने के पीछे का वास्तविक दार्शनिक कारण क्या है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि यद्यपि अर्थशास्त्र के अनुसार आततायी का वध करने में पाप नहीं लगता, फिर भी अर्जुन धर्मशास्त्र का तर्क देकर युद्ध से हटना चाहता है। वह ऐसा अपने पारिवारिक संबंधों से निर्मित अपने अहंकार को बचाने और समाज में होने वाले पश्चाताप व अपमान से बचने के लिए कर रहा है, जो कि एक सशर्त (उपाधिक) वैराग्य है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन शास्त्रों से अनभिज्ञ नहीं था और न ही वह कौरवों को संत मानता था; वह स्वयं कौरवों को 'आतताई' कहकर स्वीकार करता है, फिर भी अपने अहंकार की रक्षा हेतु ऐसे तर्क गढ़ता है।