भ. गी. 1.35

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥

अनुवाद

हे मधुसूदन ! यदि मैं उनके द्वारा मारा भी जाऊँ, तो भी मैं तीनों लोकों पर प्रभुत्व के लिए भी उन्हें मारना नहीं चाहता। पृथ्वी पर प्रभुत्व तो दूर की बात है।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान में भगवान श्री कृष्ण के 'मधुसूदन' नाम की जो पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि बताई गई है, उसके अनुसार मानव मन के वे दो कौन से मुख्य दोष हैं जिन्हें 'मधु' और 'कैटभ' असुरों का रूप माना गया है?

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