भ. गी. 1.37
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥
अनुवाद
इसलिए, अपने ही सम्बन्धी, धृतराष्ट्र के इन पुत्रों की हत्या करना हमारे लिए उचित नहीं है । हे माधव! हम अपने ही स्वजनों की हत्या करके कैसे सुखी हो सकते हैं?
इसलिए, अपने ही सम्बन्धी, धृतराष्ट्र के इन पुत्रों की हत्या करना हमारे लिए उचित नहीं है । हे माधव! हम अपने ही स्वजनों की हत्या करके कैसे सुखी हो सकते हैं?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह दूसरों के दोषों (जैसे लोभ) को आसानी से देख लेता है, परंतु अपने दोष (जैसे मोह और आसक्ति) को नहीं देख पाता। जब हम दूसरों में दोष देखते हैं, तो उसके पीछे हमारा अभिमान काम करता है जो टॉर्च की रोशनी की तरह केवल दूसरों पर केंद्रित रहता है, स्वयं पर नहीं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन इस समय निष्काम या स्थितप्रज्ञ नहीं है, बल्कि वह स्वयं मोह और आसक्ति से ग्रस्त है। वह केवल अपनी दृष्टि को सूक्ष्म मानकर दूसरों के लोभ को देख रहा है, जबकि अपने मोह को पहचानने में असमर्थ है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि जब तक किसी वस्तु या व्यक्ति में हमारा ममत्व नहीं होता, तब तक उससे कोई सुख या दुःख नहीं मिलता। वस्तु के नष्ट होने पर दुःख वस्तु के जाने का नहीं, बल्कि उसमें निहित हमारे ममत्व के टूटने का होता है। इसके साथ ही, कुल ही समाज की मूल इकाई है; कुलधर्म नष्ट होने से अधर्म बढ़ता है और समाज में अशांति फैलती है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार वस्तुएँ या संबंध स्वयं में सुख-दुःख के कारण नहीं हैं, बल्कि हमारी आसक्ति ही कारण है। इसके अलावा, कुलधर्म को केवल पुरानी रूढ़ि नहीं माना गया है, बल्कि इसे समाज को धारण करने वाली और अधर्म से बचाने वाली मूल व्यवस्था बताया गया है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।