जब कुल नष्ट हो जाता है, तो प्राचीन कुल परम्पराएँ लुप्त हो जाती हैं और कुल परम्पराओं के नष्ट होने से, अधर्म* पूरे कुल पर हावी हो जाता है।
टिप्पणियाँ
* अधर्म, धर्म का विपरीत है। धर्म का अर्थ है विहित कर्तव्य अथवा व्यक्ति के स्वभाव के अनुरूप कर्म और आचरण का वह क्षेत्र, जिसका पालन उसे संपूर्ण समष्टि के साथ पूर्ण सामंजस्य में रहने के लिए करना चाहिए।
व्याख्यान के अनुसार, अर्जुन जब दुर्योधन आदि को 'लोभोपहतचेतसः' (लोभ से ढके चित्त वाले) कहता है और उनके दोष देखता है, तब इस स्थिति का वक्ता द्वारा क्या सूक्ष्म दार्शनिक विश्लेषण किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह दूसरों के दोषों (जैसे लोभ) को आसानी से देख लेता है, परंतु अपने दोष (जैसे मोह और आसक्ति) को नहीं देख पाता। जब हम दूसरों में दोष देखते हैं, तो उसके पीछे हमारा अभिमान काम करता है जो टॉर्च की रोशनी की तरह केवल दूसरों पर केंद्रित रहता है, स्वयं पर नहीं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन इस समय निष्काम या स्थितप्रज्ञ नहीं है, बल्कि वह स्वयं मोह और आसक्ति से ग्रस्त है। वह केवल अपनी दृष्टि को सूक्ष्म मानकर दूसरों के लोभ को देख रहा है, जबकि अपने मोह को पहचानने में असमर्थ है।
व्याख्यान के अनुसार, वस्तुओं या पारिवारिक संबंधों से प्राप्त होने वाले सुख-दुःख का वास्तविक मूल कारण क्या है, और 'कुलधर्म' के नष्ट होने का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि जब तक किसी वस्तु या व्यक्ति में हमारा ममत्व नहीं होता, तब तक उससे कोई सुख या दुःख नहीं मिलता। वस्तु के नष्ट होने पर दुःख वस्तु के जाने का नहीं, बल्कि उसमें निहित हमारे ममत्व के टूटने का होता है। इसके साथ ही, कुल ही समाज की मूल इकाई है; कुलधर्म नष्ट होने से अधर्म बढ़ता है और समाज में अशांति फैलती है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार वस्तुएँ या संबंध स्वयं में सुख-दुःख के कारण नहीं हैं, बल्कि हमारी आसक्ति ही कारण है। इसके अलावा, कुलधर्म को केवल पुरानी रूढ़ि नहीं माना गया है, बल्कि इसे समाज को धारण करने वाली और अधर्म से बचाने वाली मूल व्यवस्था बताया गया है।